संत कबीर ने भी व्यापक रूप में राम का नाम लिया है। राम का नाम स्मरण के कारण बहुतेरे लोग कबीर को वैष्णव संप्रदाय का अनुयायी मानते हैं। राम का नाम लेने के कारण रामानंदी संप्रदाय के लोग कबीर को रामानंद का शिष्य कहते हैं। रमते इति राम। जो कण-कण में रमते हों उसे राम कहते हैं।
कबीर दास कहते हैं कि घाट-घाट राम बसत हैं भाई, बिना ज्ञान नहीं देत दिखाई। आतम ज्ञान जाहि घट होई, आतम राम को चीन्है सोई। कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूंढे वन माहि। ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया खोजत नाहिं।