लखनऊ से लेकर दिल्ली तक की सत्ता के केंद्र में रहे औरंगाबाद हाउस में कभी दिन भर चेहरा दिखाने की होड़ में रहने वाले नेताओं का जमावड़ा होता था। चाहे अच्छे स्कूल में बेटे-बेटियों के दाखिले की फिक्र रही हो या नौकरी की तलाश।
पूर्वांचल से लेकर यूपी, बिहार तक लोग इसी हाउस के इर्द-गिर्द मंडराते नजर आते थे। सूबे के मुख्यमंत्री और रेल मंत्री रहे पं. कमलापति त्रिपाठी की राजनीतिक विरासत संभालने और उसे आगे बढ़ाने में उनकी चौथी पीढ़ी नई संभावनाओं के साथ जुटी हुई है।
आज पढ़िए पंडित जी की राजनीतिक-सामाजिक मर्यादाओं और सिद्धांतों के बारे में।....
काशी में सांस्कृतिक विरासत की रेल चलाने की बात हो या उम्मीदों की जमीन पर विकास की फसल रोपने की। यूपी के सीएम के तौर पर पं. कमलापति त्रिपाठी की दूरदर्शिता और उनकी लोक सेवा की भावना को लोग आज भी याद करते हैं।
पं. कमलापति त्रिपाठी की नजर में सभी अपने थे। उनका राजनीतिक कद जितना विराट था, व्यक्तित्व उतना ही सहज और साधारण।
उन्होंने अपने लिए नहीं, हमेशा समाज के लिए जिया। दिल्ली से बाबू जी जब औरंगाबाद आते तो गंगा घाट का किनारा और कुबेर का पान खाना नहीं भूलते थे।
सबका हालचाल पूछना और सबकी समस्याओं को सुनना, सुख-दुख को साझा करना उनकी आदत थी।
बाबू जी के लिए परिवार नहीं समाज ऊपर था। 90 के दशक के बाद तक जिस औरंगाबाद हाउस में रोज राजनीतिक हलचल मचती थी, सियासतबाजों के जमावड़े लगते थे, वहां गुरुवार को खामोशी नजर आई।
संयोगवश पंडित जी के साथ अंत तक 9, जनपथ दिल्ली के आवास में रहने वाले उनके प्रपौत्र सोमेश पति त्रिपाठी अकेले मिल गए।
पूछने पर कहने लगे कि क्या-क्या और कितना बताऊं।
उनके बारे में जितना कहा जाए, लिखा जाए कम होगा। अलमारी से कुछ किताबें निकालते हुए बोले, इसी में देख लीजिएगा।
कुरेदने पर उनकी चुप्पी टूटी।
बोले, 1986 मैं मॉडर्न स्कूल से 12वीं पास हुआ था और दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफन कॉलेज में दाखिला लेने की मेरी इच्छा थी लेकिन नंबर कम होने की वजह से दाखिला तो दूर फार्म तक नहीं मिल सका। यह बात बाबू जी के सेक्रेटरी वी रघु को पता थी।