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राजनीति के पुरोधा: राजनीति का गढ़ रहा है काशी का औरंगाबाद हाउस

Fri, 13 Jan 2017 05:28 PM IST
अनूप ओझा,अमर उजाला,वाराणसी
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समाज के लिए कभी परिवार की चिंता नहीं की थी पं. कमलापति त्रिपाठी ने - फोटो : अमर उजाला
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लखनऊ से लेकर दिल्ली तक की सत्ता के केंद्र में रहे औरंगाबाद हाउस में कभी दिन भर चेहरा दिखाने की होड़ में रहने वाले नेताओं का जमावड़ा होता था। चाहे अच्छे स्कूल में बेटे-बेटियों के दाखिले की फिक्र रही हो या नौकरी की तलाश।
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पूर्वांचल से लेकर यूपी, बिहार तक लोग इसी हाउस के इर्द-गिर्द मंडराते नजर आते थे। सूबे के मुख्यमंत्री और रेल मंत्री रहे पं. कमलापति त्रिपाठी की राजनीतिक विरासत संभालने और उसे आगे बढ़ाने में उनकी चौथी पीढ़ी नई संभावनाओं के साथ जुटी हुई है।
आज पढ़िए पंडित जी की राजनीतिक-सामाजिक मर्यादाओं और सिद्धांतों के बारे में।....

काशी में सांस्कृतिक विरासत की रेल चलाने की बात हो या उम्मीदों की जमीन पर विकास की फसल रोपने की। यूपी के सीएम के तौर पर पं. कमलापति त्रिपाठी की दूरदर्शिता और उनकी लोक सेवा की भावना को लोग आज भी याद करते हैं।
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पं. कमलापति त्रिपाठी की नजर में सभी अपने थे। उनका राजनीतिक कद जितना विराट था, व्यक्तित्व उतना ही सहज और साधारण।
उन्होंने अपने लिए नहीं, हमेशा समाज के लिए जिया। दिल्ली से बाबू जी जब औरंगाबाद आते तो गंगा घाट का किनारा और कुबेर का पान खाना नहीं भूलते थे।
सबका हालचाल पूछना और सबकी समस्याओं को सुनना, सुख-दुख को साझा करना उनकी आदत थी। 
बाबू जी के लिए परिवार नहीं समाज ऊपर था। 90 के दशक के बाद तक जिस औरंगाबाद हाउस में रोज राजनीतिक हलचल मचती थी, सियासतबाजों के जमावड़े लगते थे, वहां गुरुवार को खामोशी नजर आई।
संयोगवश पंडित जी के साथ अंत तक 9, जनपथ दिल्ली के आवास में रहने वाले उनके प्रपौत्र सोमेश पति त्रिपाठी अकेले मिल गए।
पूछने पर कहने लगे कि क्या-क्या और कितना बताऊं।
उनके बारे में जितना कहा जाए, लिखा जाए कम होगा। अलमारी से कुछ किताबें निकालते हुए बोले, इसी में देख लीजिएगा। 
कुरेदने पर उनकी चुप्पी टूटी।
बोले, 1986 मैं मॉडर्न स्कूल से 12वीं पास हुआ था और दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफन कॉलेज में दाखिला लेने की मेरी इच्छा थी लेकिन नंबर कम होने की वजह से दाखिला तो दूर फार्म तक नहीं मिल सका। यह बात बाबू जी के सेक्रेटरी वी रघु को पता थी।
 
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महीने भर न बाबू जी के पैर छुए, न बात की

बाबू जी सिद्धांतों से समझौता न करने वाले और आदर्श राजनीति के स्तंभ थे - फोटो : अमर उजाला
एक दिन उन्होंने मुझे बताया कि आज स्टीफन कॉलेज के प्रिसिंपल बाबूजी के पास किसी काम से आ रहे हैं। उसी समय इशारा हो गया तो एडमिशन हो जाएगा।
​ मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। मैं बाबूजी के कमरे में पहुंचा और उनके कान में बताया कि मेरा दाखिला करवा दीजिए। उस वक्त एक बुजुर्ग अपने साथ एक युवक को लेकर पहले से उनके पास बैठे थे। कुछ देर में प्रिसिंपल साहब आ गए। उन्होंने अपने काम के लिए बाबू जी से आग्रह किया। वह बाबू जी के एक फोन पर हो गया। 
फिर बाबू जी ने उनसे कहा कि सुनता हूं आपके कॉलेज में दाखिले का नियम कड़ा है। एक दाखिला आप ले सकते हैं। प्रिंसिपल ने सिर हिलाते हुए कहा- जी बाबू जी, आदेश कीजिए। बाबू जी ने फिर जो कहा मैं सुनकर अवाक रह गया। उन्होंने कहा कि मेरे सामने जो लड़का बैठा है उसका दाखिला ले लीजिए। प्रिंसिपल ने तत्काल हामी भर दी। 
सोमेश पति बताते हैं कि दाखिला न होने से मुझे इतना दुख हुआ कि मैंने महीने भर बाबू जी से बात नहीं की।
खाने की टेबल पर भी नहीं जाता था। इससे पहले मैं सुबह उठकर रोज उनके पैर छूता था लेकिन वह क्रम टूट गया। एक दिन उनका नौकर लालता मेरे पास आया।
बोला, बाबू जी आपको पूछ रहे थे। एक दिन शाम पांच बजे वह मेरे कमरे में आए। तब मैं सोया था। हिलाने-डुलाने पर मैं हड़बड़ाकर उठा तो बाबूजी को सामने देख हैरान रह गया।
वो बोले कि- मुझसे नाराज हो? मैं अभी टहलने जा रहा हूं। 40 मिनट में आऊंगा, तब तक तैयार हो जाना। तुमसे बात करनी है। मैं तैयार हो गया। बाबू जी समय पर आ गए। कहने लगे-तुम जरा सोचो...।
तुम्हारे साथ तो एक सीएम, रेल मंत्री का नाम जुड़ा है। कमी क्या है? आगे कुछ भी कर सकते हो, लेकिन उस दिन दाखिला की सिफारिश लेकर आए लड़के के साथ क्या था।
उसका एडमिशन होने से उस परिवार की भी पीढ़ियां सुधर जाएंगी। हमेशा याद रखना, पहले अपनी नहीं, दूसरों की चिंता करनी चाहिए। बाबू जी की बातें सुनकर मेरी आंखों से परदा हट गया।
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