सोनभद्र। हाथ में धनुष, निगाहें लक्ष्य पर और दिल में देश का नाम ऊंचा करने का जज्बा… सोनभद्र के होनहार तीरंदाजों की यही मनोदशा है। सीमित संसाधनों के बावजूद वह बड़े सपनों को साध रहे हैं। दीपिका कुमारी, रजत चौहान से प्रेरित होकर यह तीरंदाज अपने निशाने से भविष्य की नई कहानी लिखने में जुटे हैं।
आदिवासी बहुल जिले में तीरंदाजी मुख्य खेल है। यहां के ग्रामीण क्षेत्रों में लकड़ी के तीर धनुष लेकर बच्चे कम उम्र में ही निशाना साधने में जुट जाते हैं। खेल विभाग की ओर से जिले में बालक-बालिकाओं के लिए अलग-अलग तीरंदाजी हॉस्टल भी स्थापित किया गया है। हाॅस्टल में कोच हैं, प्रशिक्षण की सुविधाएं भी हैं, लेकिन खिलाड़ियों के पास तीर-धनुष का टोटा है। महंगे उपकरण आसानी से सुलभ न होने के बाद भी वह अपने हौसलों के बूते सफलता की कहानी लिखने में जुटे हुए हैं। पेड़ की टहनियों से बने अस्थाई धनुष-बाण के साथ खेल की शुरुआत करने वाले कई बच्चे अब राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में जिले का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। तीरंदाजी हॉस्टल में प्रशिक्षण ले रहे अभिषेक गुप्ता ने हाल ही में 68वीं नेशनल स्कूल गेम्स के रिकर्व राउंड में टीम के साथ रजत पदक जीता है। 15 वर्षीय अभिषेक राजा शारदा महेश इंटर कॉलेज के छात्र हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। फिर भी वह अपने दम पर सपनों को पूरा करने में जुटे हैं। पिछले दिनों प्रदेश सरकार ने उन्हें 25 हजार के नकद पुरस्कार से भी सम्मानित किया था। अभिषेक की तरह ही प्रियांशु, शुभम, बालकिशन ने भी सब जूनियर वर्ग की राष्ट्रीय स्पर्धा में हिस्सा लिया और सराहना पाई।
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बेटियां भी कम नहीं
तीरंदाजी में बेटियां भी तेजी से आगे बढ़ रही हैं। स्कूल-कॉलेज की छात्राएं आत्मविश्वास के साथ अभ्यास कर रही हैं। नंदिनी, आकांक्षा, सुलेखा, हीरा, दीक्षा मिश्रा राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुकी हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद माता-पिता अपनी बेटियों को खेल में आगे बढ़ाने में पीछे नहीं हैं। खिलाड़ियों का कहना है कि अगर जिले में आधुनिक तीरंदाजी उपकरण उपलब्ध हों तो यहां की प्रतिभा ओलंपिक तक जा सकती है। कोच विश्वास शर्मा और सुमंगला शर्मा ने बताया कि सोनभद्र में तीरंदाजी का भविष्य बेहतर है। यहां खिलाड़ियों में तीरंदाजी के प्रति जबरदस्त ललक है। पूरी संभावना है कि जल्द ही सोनभद्र की धरती का भी खिलाड़ी ओलंपिक में तिरंगा लहराएगा।
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जिम्मेदारियों का बोझ, फिर भी चमक बिखेर रहे ताइक्वांडो खिलाड़ी रवि सिंह
- आईसीयू में भर्ती थे पिता फिर भी नहीं हारी हिम्मत, जीता देश के लिए कांस्य
संवाद न्यूज एजेंसी
रेणुकूट। रेणुकूट निवासी अंतरराष्ट्रीय ताइक्वांडो खिलाड़ी रवि सिंह संघर्षों के बीच सफलता की कहानी लिख रहे हैं। एक हाथ में पिता की बीमारी की चिंता और कंधों पर परिवार की जिम्मेदारी के बीच उन्होंने न केवल खेल जगत में अपनी पहचान बनाई, बल्कि युवाओं के लिए प्रेरणा भी बने।
खेल का मैदान कभी भी आसान नहीं होता, लेकिन रवि के लिए यह और कठिन था। कई बार बड़े टूर्नामेंट के लिए उनका चयन हुआ, मगर पिता महामाया सिंह की गंभीर बीमारी ने उन्हें पीछे खींच लिया। कई मौके ऐसे आए जब अस्पताल और खेल का मैदान दोनों के बीच उन्हें चुनाव करना पड़ा। हर बार दिल टूटा, पर हिम्मत नहीं। वे ओलंपिक रैंकिंग एथलीट हैं। वह अब तक आठ से अधिक बार भारत का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। साउथ कोरिया से ब्लैक बेल्ट, एनआईएस कोच और ए-क्लास राष्ट्रीय रेफरी रवि सिंह को खेल में योगदान के लिए राज्यपाल पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। खिलाड़ी के साथ रवि कोच भी हैं। वे चार बार यूपी टीम के कोच रह चुके हैं। रवि ने बताया कि वर्ष 2025 उनके जीवन के कठिन यादों में से एक रहा। थाईलैंड में आयोजित हीरोज़ ताइक्वांडो इंटरनेशनल चैंपियनशिप में हिस्सा लेने से ठीक पहले पिताजी आईसीयू में भर्ती थे। दोराहे के बीच खड़े रवि ने फैसला किया कि पिता भी यही चाहेंगे कि बेटा तिरंगा लहराए। भारी मन से वे मैदान पर उतरे और कांस्य पदक जीतकर देश का मान बढ़ाया। इसके बाद नेपाल के पोखरा में आयोजित एशिया कप ओपन इंटरनेशनल ताइक्वांडो चैंपियनशिप 2025 में उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक जीता और तिरंगे को ऊंचा किया। रवि का कहना है कि कठिनाइयां चाहे कितनी भी क्यों न हों, अगर दिल में जज्बा हो तो हर मंज़िल हासिल की जा सकती है।
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