गृहमंत्री ने कहा कि जो देश अपनी भाषा खो देता है, वो देश अपनी सभ्यता, संस्कृति और अपने मौलिक चिंतन को भी खो देता है। जो देश अपने मौलिक चिंतन को खो देते हैं वो दुनिया को आगे बढ़ाने में योगदान नहीं कर सकते हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली लिपिबद्ध भाषाएं भारत में हैं। उन्हें हमें आगे बढ़ाना है।
काशी हमेशा विद्या की राजधानी है। उन्होंने कहा काशी सांस्कृतिक नगरी है। देश के इतिहास को काशी से अलग कर नहीं देख सकते। काशी भाषाओं का गोमुख है। हिंदी का जन्म काशी से हुआ है। 1868 में काशी से ही शिक्षा हिंदी में हुई।
हिंदी के उन्नयन के लिए काशी से शुरुआत हुई। पहली हिंदी पत्रिका काशी से ही शुरु हुई। मालवीय ने हिंदी में बिना चंता के पढ़ाई की। गृहमंत्री ने कहा कि तुलसी दास को कैसे भूल सकते हैं। अगर उन्होंने राम चरित मानस नहीं लिखी होती तो आज रामायण लोग भूल जाते।
अनेक हिंदी के विद्वानों यहीं से भाषा को आगे बढ़ाया। हिंदी भाषा में विवाद खड़ा किया गया। एक समय ऐसा आएगा कि लोग हिंदी नहीं बोल सकेंगे तो लघुता महसूस होगी। जो देश अपनी भाषा को खो देता है तो वह संस्कृति को खो देता है।
भाषा जितनी सशक्त और समृद्ध होगी, उतनी ही संस्कृति व सभ्यता विस्तृत और सशक्त होगी। अपनी भाषा से लगाव और अपनी भाषा के उपयोग में कभी भी शर्म मत कीजिए, ये गौरव का विषय है। शाह ने कहा, 'मैं गौरव के साथ कहना चाहता हूं कि आज गृह मंत्रालय में अब एक भी फाइल ऐसी नहीं है, जो अंग्रेजी में लिखी जाती या पढ़ी जाती है, पूरी तरह हमने राजभाषा को स्वीकार किया है। बहुत सारे विभाग भी इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं'