सपा से पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के आजमगढ़ से चुनाव मैदान में उतरने की वजह सीट को परिवार के पास रखना ही नहीं बल्कि पूर्वांचल में अपनी सियासी स्थिति और बेहतर करने का अवसर है। 2014 में वाराणसी से नरेंद्र मोदी के मुकाबले पूर्वांचल की लड़ाई को चर्चा में रखने के लिए मुलायम सिंह यादव मैनपुरी के साथ-साथ इस सीट से चुनाव लड़े थे।
मोदी लहर में मुलायम ने आजमगढ़ में जीत भी हासिल कर ली थी, पर आजमगढ़, गाजीपुर और बलिया सीट के अलावा सपा उम्मीदवारों का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। लालगंज में सपा के बेचई सरोज, बलिया में नीरज शेखर और गाजीपुर में शिवकन्या कुशवाहा ही दूसरे स्थान पर रही थी। दूसरी ओर क्षेत्र से बसपा के किसी बड़े नेता के चुनाव न लड़ने के बाद भी पार्टी दूसरे नंबर पर रही थी।
घोसी से दारा सिंह चौहान, जौनपुर से सुभाष पांडे, चंदौली से अनिल मौर्य दूसरे नंबर पर रहे थे। इस चुनाव में गठबंधन के बाद अखिलेश के लिए यह इसलिए भी जरूरी हो गया है, क्योंकि इस इलाके में उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव का भी प्रभाव माना जा रहा है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अखिलेश आजमगढ़ के चुनावी मुकाबले को ही चर्चित नहीं बनाएंगे, बल्कि विधानसभा चुनाव लड़े बगैर मुख्यमंत्री बनने के समय उठे सवालों का भी जवाब दे सकेंगे।
यही नहीं, पूर्वांचल में गठबंधन खासतौर पर सपा को जो भी सीटें मिलेंगी, उनमें उनका योगदान महत्वपूर्ण हो जाएगा। वाराणसी, मिर्जापुर और आजमगढ़ मंडल की 12 सीटों में से मिज़ार्पुर, भदोही, रॉबर्ट्सगंज और मछलीशहर में भी बसपा प्रत्याशी ही दूसरे स्थान पर रहे थे। इन्हीं परिणामों के आधार पर 2017 के विधानसभा चुनाव के नतीजों का आकलन किया जा रहा था। अब अखिलेश उस अवसर का लाभ ले सकते हैं।