सावन जीवन में भी रंग भरता है और प्रकृति में भी। यह महीना उजड़े चमन को हरा भरा कर देता है। पौधों में नई पत्तियां, नए कल्ले फूटते हैं। तन-मन पर छाई उदासी की धूल धुल जाती है। सावन में प्रकृति सर्वत्र हरी दिखाई देने लगती है। मेघों के आगमन के साथ ही प्रकृति में एक खास तरह की खुशबू घुलने लगती है। महाकवि कालिदास ने लिखा है- मेघालोके भवति सुखिनोप्यन्यथावृत्तिचेत:। यानी पावस ऋतु के मेघ जीवन में सुख-संपन्नता लेकर आते है। मिर्जापुर, बनारस में इसी महीने कजरी गाई जाती है।
लोक गीतों में प्रेम-माधुर्य की धुनों पर आधारित कजरी का नाम सावन में घिरने वाली काली घटाओं के प्रतीक के रूप में किया गया है। काजल के समान काली घटाओं के चलते ही इस महीने में झूले पर पिया की याद में गाए जाने वाले लोक गीत का नाम कजरी पड़ा। यह कहना है कि बीएचयू के संगीत एवं मंच कला संकाय के गायन विभाग के शिक्षक डॉ. विजय कपूर का। उनका कहना है कि बनारस से भोजपुर तक कजरी खूब गाई जाती है। सावन की शुरुआत की कजरी से होती है। गांव, गांव में झूले पड़ जाते हैं। स्त्रियां झूला झूलने के साथ ही कजरी गाती हैं। खासकर मिर्जापुर की कजरी तो पूरे उत्तर भारत में सुरों की लोच और मिठास के लिए विख्यात है। घरेले बदरिया घनघोर हो सवनवां में ना अइलें ननदी...जैसी कजरी खूब गाई जाती है। घटाएं जब घिरने लगती हैं तब बरबस प्रियतम की याद आने लगती है। वह बताते हैं कि कजरी प्रेम विरह की उपज है। इसमें शृंगार की उभयपक्ष की झांकी हमें देखने को मिलती है। कहीं झूला झूलने के लिए उत्सुक भौजाई अपनी ननद से पूछती है कि हे ननद बादल उमड़े चले आ रहे हैं?
मैं सावन में कजरी खेलने कैसे जाऊंगी। कजरी की बंदिश वह गुनगुनाते हैं, कइसे खेले जइबू सावन में कजरिया/बदरिया घेरि आई ननदी...। इस पर ननद संवाद करते हुए कहती है कि आजकल का दिन मस्ती का है। कोई रास्ता रोकने लगेगा तब क्या करोगी? मत जाओ..। कजरी में वह इस भाव को इस तरह व्यक्त करती हैं- तूं त जात हऊ अकेली/ केहू संग ना सहेली/ गुंडा छेकि लीहें तोहरी डगरिया/ बदरिया घेरि आई ननदी...। संयोग शृंगार के साथ वियोग शृंगार की गंभीर अभिव्यंजना कजरी में मिलती है। पति के परदेस होने की वजह से विरह का सावन में पैदा होना स्वाभाविक है। विजय कपूर बताते हैं कि सावन में गाई जाने वाली कजरी का इतिहास बहुत पुराना है। इसमें ग्रामीण क्षेत्रों में कहीं कजरी खेलने की प्रथा है तो कहीं ढुनमुनिया खेलने की। कजरी खेलने का संबंध जलक्रीडा से भी है। वर्षा का जल सावन में जब जगह-जगह इकट्ठा हो जाता है, तब कजरी खेली जाती है। कजरी गायन मुख्यत: मिर्जापुर से शुरू होकर बनारस, पूर्वी उत्तर प्रदेश से बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड तक लंबे समय से होता रहा है।