पार्किंसंस प्लस सिंड्रोम की वजह से युवाओं की याददाश्त कमजोर होने के साथ ही उनके हाथ, पैर और दिमाग की नसें सूख रही हैं। पहले यह बीमारी 50 साल से अधिक उम्र वालों की होती थी, अब 30 से 40 साल वाले युवा भी इसकी चपेट में आ रहे हैं।
बीएचयू अस्पताल में हर माह 100 नए मरीज पहुंच रहे हैं। इनमें युवा ज्यादा होते हैं।आईएमएस बीएचयू के न्यूरोलॉजी विभाग के डॉक्टर भी चिंतित हैं। इस पर नए सिरे से अध्ययन भी शुरू हो गया है। पार्किंसंस के प्रति जागरूकता को लेकर हर साल 11 अप्रैल को विश्व पार्किंसंस दिवस मनाया जाता है।
न्यूरोलॉजी विभाग के अध्यक्ष प्रो. विजयनाथ मिश्र का कहना है कि ये सामान्य पार्किंसंस से कहीं अधिक प्रभावशाली होता है। इसमें शरीर की नसें (हाथ-पैर और दिमाग की नस) तेजी से सूखने लगती है। खास बात यह है कि पार्किंसंस ग्रसित मरीजों की दवाओं का असर पार्किंसंस प्लस सिंड्रोम वाले मरीजों पर नहीं होता है।
अमेरिकी विश्वविद्यालय के साथ अध्ययन में जुटी आईएमएस की टीम
अमेरिका के पिटसबर्ग विश्वविद्यालय के साथ मिलकर न्यूरोलॉजी विभाग की डॉक्टरों की टीम युवाओं में इस बीमारी को लेकर कारणों का पता लगा रही है। प्रो. विजयनाथ मिश्र का कहना है कि पार्किंसंस ग्रसित मरीज के लड़खड़ाने, याददाश्त कमजोर होने, हाथ, पैर की नसें सूखने की समस्या बाद में पता चलती है, लेकिन पार्किंसंस प्लस सिंड्रोम में इसका जल्दी ही पता चल जाता है। इस पर जेनेटिक स्टडीज की जा रही है।
नशाखोरी, प्रदूषण, खानपान में बदलाव बीमारी का प्रमुख वजह
पार्किंसंस प्लस सिंड्रोम की मुख्य वजह नशाखोरी, प्रदूषण, खानपान में बदलाव है। विशेषकर युवाओं में यह प्रचलन बढ़ा है। युवाओं को सामान्य भोजन की तुलना में फास्ट फूड खाना अच्छा लगता है। 30 से 40 साल वाले युवा नशे की गिरफ्त में आते जा रहे हैं। युवाओं को जागरूक करने की जरूरत है।
पार्किंसंस प्लस सिंड्रोम के लक्षण
- मरीज चलते चलते बार-बार गिरने लगता है।
- दो साल में याददाश्त कमजोर होने लगती है।
- सामाजिक व्यवहार में बदलाव दिखने लगता है।
- अनिद्रा की शिकायत रहती है और सपने भी आते हैं।
- मिर्गी जैसे झटके आने लगते हैं।