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चिंताजनक: 22 महीने में 190 गर्भवती महिलाओं की इलाज के दौरान मौत, बीएचयू में 10 माह में 44 की गई जान

Tue, 14 Apr 2026 12:53 PM IST
Pragati Chand अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News: वाराणसी जिले में 22 महीने में 190 गर्भवती महिलाओं की इलाज के दौरान मौत हुई, इसमें बीएचयू में ही 10 माह में 44 की जान गई। ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे अधिक 56% मौतें हुईं। हर महीने 2000 से अधिक गर्भवती महिलाओं का इलाज हो रहा है। 
 
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Pregnant Women - फोटो : freepik.com
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विस्तार
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वाराणसी जिले के सरकारी और निजी अस्पतालों में 22 महीन में 190 गर्भवती महिलाओं की इलाज के दौरान मौत हुई है। इनमें अधिकतर महिलाएं समय से अस्पताल भी नहीं पहुंच पाई हैं। जिला स्वास्थ्य समिति की फरवरी 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, अकेले बीएचयू में 50 से अधिक महिलाओं की इलाज के दौरान मौत हुई है, इनमें महज 10 महीनों में ही 44 महिलाओं ने दम तोड़ा है। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में आराजीलाइन, चिरईगांव और हरहुआ ब्लॉक के ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे अधिक 56 प्रतिशत मौतें हुई हैं। 

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जिले के आठ ब्लॉक के सरकारी व निजी अस्पताल, सीएचसी-पीएचसी, जिला महिला अस्पताल और बीएचयू में हर महीने 2000 गर्भवती महिलाओं का इलाज हो रहा है। इलाज में पिंडरा, चोलापुर, बड़ागांव और आराजीलाइन क्षेत्र के अस्पताल लापरवाही बरत रहे हैं। समीक्षा में सामने आया है कि इन अस्पतालों में महिलाओं को समय से इलाज नहीं दिया गया, जिसके कारण मातृ मृत्यु दर बढ़ी है।

केस - 1
चिरईगांव पीएचसी क्षेत्र के ग्राम पंचायत बराईं की चांदनी (20) (पत्नी अशोक राजभर) की प्रसव के बाद आशा और रिटायर्ड एएनमए की लापरवाही से हुई। जांच और ऑडिट रिपोर्ट में सामने आया कि लालच में पड़ कर महिला की अकुशल तरीके से डिलीवरी कराई गई। प्रसूता की डिलीवरी के कुछ ही देर बाद उसकी मौत हो गई। 16 मार्च को पीड़ा होने पर सीएचसी नरपतपुर या पीएचसी में संस्थागत प्रसव के बजाय आशा उसे डुबकियां बाजार में रिटायर्ड एएनएम के निजी आवास पर ले गई। वहीं, पर दोनों ने मिलकर डिलीवरी कराई।

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केस - 2
मिर्जामुराद थाना क्षेत्र के कछवा रोड में एक क्लिनिक में गर्भवती की हालत इलाज के दौरान बिगड़ गई। बाद में वाराणसी के अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। 26 साल की विनीता राय को पेट में दर्द की शिकायत पर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिजनों का आरोप था कि महिला को लगातार दो दिन तक क्लिनिक में रखकर इलाज किया गया, लेकिन उसकी हालत में सुधार नहीं हुआ। अगले दिन सुबह जब स्थिति गंभीर हो गई तो डॉक्टरों ने उसे वाराणसी रेफर कर दिया। जहां इलाज के दौरान महिला की मौत हो गई।

क्या बोलीं विशेषज्ञ

जिला महिला अस्पताल की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अल्का सिंह बताती हैं कि महिलाओं की मौत मामले में ब्लीडिंग (रक्तस्त्राव) ही सबसे बड़ी समस्या सामने आई है। कई महिलाओं का यूट्रस ढीला पड़ जाता है, जिसके कारण उन्हें बचाना मुश्किल हो जाता है। कई बार ऐसी भी स्थिति आती है जब महिलाओं की जान बचाने के लिए यूट्रस निकाल लिया जाता है।

दीनदयाल एमसीएच विंग की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. ज्योति ठाकुर बताती हैं कि अत्यधिक ब्लीडिंग, हाई बीपी, इंफेक्शन के कारण महिलाओं की डिलीवरी में रिस्क बढ़ जाती है। कई महिलाएं पहले से एनेमिक होती हैं, जिनकी चौथी या पांचवीं डिलीवरी होती है।

आंकड़ों पर एक नजर
  • आराजीलाइन - 15
  • चोलापुर - 10
  • बड़ागांव - 9
  • चिरईगांव - 14
  • हरहुआ - 12
  • काशी विद्यापीठ - 11
  • पिंडरा - 12
  • सेवापुरी - 11
  • जिला महिला अस्पताल/एलबीएस रामनगर/ अर्बन सीएचसी-पीएचसी/ पीडीडीयू/बीएचयू – 104
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अपर निदेशक बोले

ग्रामीण से लेकर शहर तक गर्भवती महिलाओं की मृत्यु दर कम करने के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं। एएनएम और आंगनबाड़ी को लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। महिलाओं की जिस दिन शादी होती है, उस दिन से ही वह स्वास्थ्य विभाग में पंजीकृत हो जाती हैं। आशा कार्यकर्ताओं से उन्हें कम उम्र में मां न बनने की सलाह दी जाती है। -डॉ. एनडी शर्मा, अपर निदेशक, स्वास्थ्य विभाग 

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