वाराणसी। क्लाइमेट एजेंडा की रिपोर्ट के अनुसार शहर में वायु प्रदूषण का स्तर एक साल में ही पचास फीसदी बढ़ गया। यह हाल तब है जब क्लाइमेट चेंज की ओर से जारी सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में वाराणसी तीसरे नंबर पर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट 2018 में भी वाराणसी को दुनिया के 4300 शहरों में से तीसरा सबसे प्रदूषित शहर माना गया था। वायु तभी तक स्वच्छ मानी जाती है जब तक प्रदूषण का स्तर 60 माइक्रोग्राम क्यूबिक मीटर हो, लेकिन वर्तमान में यह 140 माइक्रोग्राम क्यूबिक मीटर से भी अधिक है। हालत यह है कि हर सांस लोगों को फेफ ड़े के कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की ओर ढकेल रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण बढ़ते वाहन और खुदी पड़ी सड़कों से उड़ने वाली धूल है। प्रदूषण में 36 फीसदी योगदान खुदी हुई सड़कों का है। कचरा और घरेलू ईंधन से 24 फीसदी प्रदूषण होता है। बावजूद इसके इस तरफ किसी का ध्यान ही नहीं है। 20 मई को बनारस में पीएम 2.5-122 और पीएम 10-265 रहा, जो मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए घातक है। शहरी स्थानीय निकाय, वन विभाग और यातायात पुलिस सहित 10 सरकारी एजेंसियों को वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने का काम सौंपा गया है, लेकिन इन संस्थाओं ने बुनियादी डाटा तक इकठ्ठा नहीं किया है। पिछले नौ सालों में बनारस की हवा 2.4 गुना ज्यादा प्रदूषित हुई है जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानदंड से लगभग 10 गुना ऊपर है। डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों के अनुसार 2016 के बाद ही बनारस वायु प्रदूषण के मामले में दिल्ली से आगे निकल गया था।
शहर में जनवरी 2019 तक 25 महीनों में पीएम-2.5 का औसत स्तर 104 दर्ज किया गया। यह राष्ट्रीय वार्षिक सुरक्षित स्तर 40 से अधिक है और डब्लूएचओ के 10 के मानक से 9.4 गुना अधिक है। कोयला, केरोसिन, पेट्रोल, डीजल, बायोमास, गोबर और कचरे को जलाने से उत्सर्जित पीएम-2.5 मानव के बालों की तुलना में लगभग 30 गुना बारीक होता है। ये कण फेफ ड़ों में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे दिल का दौरा, स्ट्रोक, फेफ ड़े का कैंसर और श्वसन संबंधी रोग हो सकते हैं।