वाराणसी। देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने वाले वीर सपूतों के बलिदानों को भुलाया नहीं जा सकता, क्योंकि उन्होंने देश की आन-बान और शान के लिए हंसते-हंसते अपने प्राण की बाजी लगा दी थी। इनमें कुछ स्वतंत्रता सेनानी ऐसे भी हैं जो जिंदा हैैं। इनमें धन्य कुमार जैन और वीके बनर्जी हैं, जो जंग-ए-आजादी की कहानी सुनाते हैं तो हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं...।
जेल में किया ध्वजारोहण
मध्य प्रदेश के सागर जनपद के खोरई गांव में जन्में धन्य कुमार जैन के बड़े भाई पंडित महेंद्र कुमार नयाचार्य वाराणसी में स्यादबाद विद्यालय भदैनी में अध्यापक थे। प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद 23-24 वर्ष की आयु में धन्य कुमार आगे की पढ़ाई के लिए यहां आ गए और दाखिला लिए। इसी समय अगस्त क्रांति शुरू हो गई, जिसमें विद्यालय के अध्यापक और विद्यार्थी राष्ट्रहित में अपना योगदान करने लगे। इस समय समाचार पत्रों के प्रकाशन पर प्रतिबंध लग गया था। ऐसे में धन्य कुमार ने मुल्तानी मिट्टी को गुथकर उसे पैड बनाया। इस पर बैगनी स्याही से अंग्रेजी सरकार द्वारा कि ए जुल्म के पर्चे तैयार कर उसे वितरित करना शुरू किया। वह गोदौलिया स्थित सिनेमा हाल में पकड़ लिए गए और चार माह की सजा सुनाई गई। जिला जेल में वो नेता जी सुभाष चंद्र बोस के सेनापतियों में से एक देवकी नंदन दीक्षित के संपर्क में आए। 26 जनवरी 1942 को कैदियों के सफेद वर्दी को फाड़कर उस पर जेल के खपरैल, आम के पत्ते से तिरंगा बनाया। साथ ही दीवारों पर खपरैल से भारत माता की कलाकृति तैयार की, फिर जेल में आम की पेड़ पर तिरंगा फहरा कर जयकारे लगाने लगे कि अंग्रेजों ने पकड़कर फिर बंद कर दिया।
अंग्रेज थानेदार को थाने में ही जला दिया
पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में 1927 में जन्मे वीके बनर्जी किशोरावस्था में अपने रिश्तेदार के घर मुजफ्फरपुर (बिहार) आए थे। यहां अगस्त क्रांति में देश का साथ दे रहे युवाओं के साथ मिलकर मीनापुर पुलिस चौकी पर जैक फ्लैग उतारकर तिरंगा फहरा रहे थे कि झण्डे की गांठ फंस गई। जिसे खोलने के लिए एक बच्चे को पोल पर चढ़ाया गया, तभी अंग्रेज थानेदार ने उसे गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। इससे बौखलाए देश प्रेमियों ने उसे दौड़ाकर अरहर के खेत में पकड़ लिया। थाने में लाकर लाठियों की गठ्ठर बनाकर उसे थाने सहित जिंदा जला दिया। इस दौरान पहुंची अंग्रेजी सेना से युवाओं की मुठभेड़ हुई, जिसमें वह पकड़ लिए गए। जेलों में जगह न होने पर सभी को समीप के एक स्कूल में बंद किया गया, मगर भोर में वह किसी तरह भाग निकले और नेपाल चले गए। यहां से वापस रक्सौल में आकर रेलवे के तार को काटते हुए पकड़ लिए गए। इस पर डेढ़ साल की सजा और 16 बेत की सजा सुनाई गई। जिसे उन्होंने मोतिहारी, मुजफ्फरपुर, पटना और भागलपुर जेल में काटा।