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अखिलेश का दरबार: हकीकत या फसाना

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महीनों के अंतराल पर पांच फरवरी को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जनता से मिलने के लिए थोड़ा समय निकाला। अखिलेश यादव ने 18 अप्रैल, 2012 को यह कहते हुए जनता दरबार शुरू किया था कि वो एक संवेदनशील मुख्यमंत्री की तरह काम करेंगे।
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सबसे पहले जनता दरबार में मुख्यमंत्री के सरकारी आवास पांच, कालिदास मार्ग पर दस हजार से अधिक लोग अपनी समस्याओं को लेकर पहुंचे थे। मुख्यमंत्री ने तय किया था कि प्रत्येक सप्ताह बुधवार को वो लोगों से अपने आवास के जनता दर्शन हॉल में मिलेंगे।

हालांकि पांच फरवरी की सुबह में भीड़ कम थी। लगभग 400 लोगों के लिए मुख्यमंत्री आवास के क़रीब एक बड़े हाल में कुर्सियों पर बैठने की सुविधा थी।

अंदर बैठे लोगों के निकलने के बाद ही बाहर क़तार में खड़े लोगों को अंदर जाने की अनुमति दी जाती थी। अंदर जो बैठे थे उनकी दरख्वास्तों पर एक बारकोड चिपका था और उसका ब्यौरा उस व्यक्ति के मोबाइल फ़ोन नंबर के साथ कंप्यूटर में दर्ज था। यदि अफसरों की मानें तो जो भी कार्रवाई की जाती है, उसकी सूचना तुरंत उस व्यक्ति के मोबाइल पर भेज दी जाती है।
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हताश और निराश लोग

यहां जनता के लिए सुविधाएं अच्छी थीं लेकिन कई लोग वहाँ से हताश और निराश निकले। लखनऊ की एक महिला को शिकायत थी कि एक पुलिसकर्मी से उनकी जान को खतरा है और मुख्यमंत्री ने उनकी बात भी नहीं सुनी।

उस रोती हुई महिला को रोककर ज़िले के एक बड़े पुलिस अधिकारी ने उससे जानकारी ली और अलग से आश्वासन दिया। एक अन्य महिला को नौकरी की दरकार थी और वो दो-तीन बार पहले भी जनता दरबार में आ चुकी थीं।

हो सकता है नौकरी दे पाना आसान ना हो, लेकिन मुख्यमंत्री के राजनीतिक क्षेत्र कन्नौज से आए विकलांग मुकेश कुमार को आर्थिक मदद की ज़रुरत है। उन्हें नहीं लगता कि उनकी प्रार्थना पर कोई सुनवाई होगी।

'नौकरी मांगने आते हैं लोग'

करीब 12 साल के मोहम्मद ज़ैद विकलांग है। इलाज के लिए उन्हें डाक्टरों ने दो लाख का खर्च बताया है। ज़ैद के पिता मुनीर अहमद भी निराश दिखे। उनके दो और बच्चे भी उसी बीमारी के शिकार हैं। ज़ैद ने बताया कि उनकी बहन तो चल भी नहीं सकती। वो मुख्यमंत्री से मदद की गुहार लगाने तो आए थे, लेकिन उन्हें किसी तरह की सहायता मिलने की उम्मीद नहीं थी।

एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के अनुसार जनता दरबार में करीब 40 प्रतिशत प्रार्थना पत्र सरकारी नौकरी के लिए होते हैं, जिसमें कुछ नहीं किया जा सकता। इसके अलावा क़रीब 30 प्रतिशत लोग तबादले की दरख्वास्त लेकर आते हैं। क़रीब 15 प्रतिशत आर्थिक सहायता के लिए और केवल 15 प्रतिशत ऐसी याचिकाओं के साथ आते हैं जिन पर कार्रवाई की जा सकती है।

पूर्व मुख्यमंत्री मायावती अपने पांच साल के कार्यकाल में जनता से कभी नहीं मिली। उन्होंने पांच, कालिदास मार्ग को आम जनता के लिए बंद कर दिया था।
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दरबार से होता है जनता का भला?

जब नए मुख्यमंत्री ने जनता दरबार की घोषणा तो लोगों में उम्मीद जगी, लेकिन बहुत जल्दी अखिलेश के जनता दरबार में रुकावटें आने लगीं। पहले यह तय किया गया कि विधान सभा के सत्र के दौरान जनता दरबार नहीं लगेंगे। फिर प्रत्येक बुधवार की जगह हर माह के पहले बुधवार को जनता दरबार लगाने का फ़ैसला किया गया।

इस साल जनवरी में पहला बुधवार एक जनवरी को पड़ा। नए वर्ष के चलते जनता दरबार को स्थगित कर दिया गया। लखनऊ के ज़िलाधिकारी अनुराग यादव कहते हैं कि जनवरी में जनता दरबार नहीं लग पाया लेकिन दिसंबर 2014 में लगा था।

इस बारे में सूचना अधिकार के भीतर मिली जानकारी के अनुसार 15 मार्च 2012 और 14 मार्च 2013 के बीच केवल सात जनता दरबार लगे। इस दौरान अप्रैल, अगस्त, सितंबर और नवंबर 2012 में एक-एक जनता दरबार आयोजित हुए थे। इन जनता दरबारों से लोगों का कितना भला हुआ है, इस बारे में तस्वीर साफ नहीं है।

पिछली मुख्यमंत्री मायावती ने खुद को जनता दरबार से दूर रखा, लेकिन उन्होंने सभी जिलाधिकारियों को लोगों की शिकायतें सुनने और उनकी समस्याओं का समाधान करने का आदेश दिया।

लेकिन सवाल यही है कि अगर प्रशासन संवेदनशील है और तुरंत कार्रवाई करता है, तो गरीब और प्रताड़ित लोगों को मीलों चलकर मुख्यमंत्री के दरवाज़े तक नहीं आना पडेगा।
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