अपनी कामयाबी की कहानी गढ़ने के लिए निर्दोष को बली चढ़ाने के किस्से कम नहीं। यूपी पुलिस ने इस संबंध में मिसाल कायम की है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे मामलों की वजह से न सिर्फ पुलिस की वर्दी पर दाग लगा है बल्कि उसकी कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में आई है। पेश हैं ऐसे 5 मामले..
दाग-1
कानपुर में कक्षा छह की छात्रा के साथ दुष्कर्म व हत्या के मामले में तो जो पुलिस ने किया वह बेहद शर्मनाक था। जिस स्कूल में छात्रा के साथ दुष्कर्म किया गया उस स्कूल के प्रबंधन से जुड़े लोगों को बचाने के लिए पुलिस ने कक्षा छह की छात्रा को ही चरित्रहीन ठहरा दिया।
पुलिस ने एक महिला चिकित्सक से इस बात का प्रमाण पत्र भी ले लिया। फिर सारा ठीकरा स्कूल के एक कर्मचारी पर फोड़ दिया गया। मामले के तूल पकड़ने के बाद पुलिस ने असली आरोपियों को गिरफ्तार करने की मुहिम शुरू की।
दाग-2
लखीमपुर के निघासन थाने में मंदबुद्धि किशोरी के साथ दुष्कर्म व हत्या के कांड में सारा थाना एक हो गया और किशोरी की लाश को उसके ही दुपट्टे से थाना परिसर में नीचे गिरे पड़े पेड़ की एक पतली सी डाल पर लटका कर इसे आत्महत्या बता दिया।
जिले के पुलिस अफसर मातहतों को बचाने की कोशिश में लगे रहे। मामले ने तूल पकड़ा तो जांच सीबीसीआईडी को सौंप दी गई थी। सीबीसीआईडी की जांच में सामने आया था कि दोष थाने के पुलिसकर्मियों का था।
दाग-3
जो एसटीएफ ने किया उसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। जनवरी 2008 के इस मामले में एसटीएफ पश्चिम बंगाल से मुख्तार उर्फ राजू को गिरफ्तार कर लाई थी और उसने राजू को हूजी आतंकी बाबू भाई का नजदीकी सहयोगी बताया था। राजू से कई दिन तक पूछताछ कर जेल भेज दिया गया था।
बाद में असलियत सामने आई तो आला अफसरों ने कहानी गढ़ दी कि गलती से दूसरे व्यक्ति को पकड़ लिया गया है और हूजी का आतंकी राजू कोई और है।
दाग-4
सनसनीखेज आरुषि व हेमराज हत्याकांड की जांच में ऊंची पहुंच वाले डॉ. राजेश तलवार को बचाने के लिए सीबीआई ने भी पुलिसिया पैंतरे अपनाए और डॉ. तलवार के कंपाउंडर कृष्णा, नौकर राज कुमार व उसके सहयोगी विजय मंडल को गिरफ्तार कर उन्हें ही हत्या का आरोपी ठहरा दिया।
सीबीआई ने उनसे जबरन उनका जुर्म कबूल कराने की कोशिश की। मामले की फिर से जांच हुई तो यह सभी बरी हो गए और सीबीआई की करतूत सामने आई।
दाग- 5
बांदा के नरैनी से विधायक पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी के आवास पर जब एक दलित महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ तो जिले की पुलिस ताल ठोंक कर स्याह को सफेद बनाने में जुट गई थी। न सिर्फ सामूहिक दुराचार की घटना को गलत ठहराया गया बल्कि पीड़ित को ही चोर ठहरा कर उसके खिलाफ चोरी की रिपोर्ट दर्ज कर उसे जेल भी भेज दिया गया। बाद में स्पष्ट हुआ तो लीपापोती की कवायद में पीड़ित की तहरीर पर मुकदमा दर्ज किया गया।
राजनीतिक दबाव ही बड़ी वजह: समाजशास्त्री
समाजशास्त्री प्रो. विनोद चंद्रा इसके लिए पुलिस महकमे पर राजनीतिक दबाव को सबसे बड़ी वजह बताते हैं। उनका कहना है पुलिस महकमे पर जब तक राजनैतिक दबाव कम नहीं होगा, ऐसे घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं रोकी जा सकेगी।
पुलिस विभाग को स्वतंत्र एजेंसी के तौर पर काम करने की छूट देना ही इस समस्या का विकल्प है। जब जिम्मेदारी अधिक होगी तो नतीजे बेहतर आएंगे। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री स्तर तक से पुलिस के लिए यह साफ संदेश होना चाहिए कि गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं होगी।