रजई काका की स्मृति में आयोजित कवि सम्मेलन में कवितापाठ करते वाणीपुत्र अर्जुन सिंह ’चांदे। संवाद
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पाटन। बैसवारी भाषा के कवि रजई काका की स्मृति में कवि सम्मेलन उनके पैतृक ग्राम जंगल बुजुर्ग में हुआ। कवियों ने रचनाएं सुनाकर वाहवाही लूटी। प्रतापगढ़ से आए कवि हर्ष बहादुर सिंह ने ‘घर-घर से अफजल निकलेंगे तो क्या हम चुप धारेंगे, हम राणा के वंशज हैं, घर में घुस कर मारेंगे’ सुनाकर माहौल में जोश भर दिया। सम्मेलन के पूर्व गायत्री शक्ति पीठ द्वारा दीप यज्ञ किया गया।
कवि सम्मेलन में योगेश चौहान ने ‘यदि पटेल भारत माता की छाती पर जिंदा होता, तो देशद्रोहियों के गर्दन में फांसी का फंदा होता’ पढ़ा। झांसी से आए श्रंगार के कवि अर्जुन सिंह चांद ने पढ़ा ‘जब से अधरों की तू ही हंसी हो गई, प्रीत भी फूल की पांखरी हो गई, तन तो मथुरा हुआ मन हुआ वृंदावन, जिंदगी कृष्ण की बांसुरी हो गई’। हास्य के कवि मधुप श्रीवास्तव ‘नरकंकाल’ ने ‘अब के बरस नहीं बरसे बदरवा, बरसत नैना हमार रे, सावन मा मनभावन लागत मेघा भये गद्दार रे’ पढ़कर खूब गुदगुदाया। सम्मेलन में नीलम परिहार, रामेश्वर प्रसाद द्विवेदी प्रलयंकर, कवि नरेंद्र आनंद, कमलेश शुक्ल समेत अन्य कवियों ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को रात भर बांधे रखा। इसके पूर्व रायबरेली से आई गायत्री पीठ की टीम ने दीप यज्ञ संपन्न कराया। कवि सम्मेलन का संचालन सुरेश बहादुर सिंह फक्कड़ ने किया। अध्यक्षता रामेश्वर प्रसाद द्विवेदी प्रलयंकर ने किया। कवि रजई काका के पुत्र संतोष सिंह, श्रवण सिंह, राजकुमार सिंह, प्रमोद सिंह व आशुतोष सिंह ने सभी का आभार व्यक्त किया।