अचलगंज (उन्नाव)। ‘जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है, वह नर नहीं नर पशु निरा और मृतक समान है’। ‘जो भरा नहीं भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं, वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमेें स्वदेश का प्यार नहीं’। देशभक्ति से ओतप्रोत कविता लिखकर लोगों में जोश का संचार करने वाले आचार्य प्रवर स्व. पंडित गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ उन्नाव के हड़हा के रहने वाले थे। उनका प्रभाव न केवल पढ़े-लिखे समाज में था बल्कि राजा-महाराज भी सनेही का बड़ा आदर करते थे। श्री सनेही की जयंती स्मृति दिवस के रूप मेें पंडित गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ स्मारक संस्थान प्रति वर्ष उनके जन्मदिन 21 अगस्त के बजाए 21 सितंबर को मनाता है।
सनेही ने साहित्य क्षेत्र में जब कवि के रूप मेें पदार्पण किया था तो वह युग हिंदी के लिए ही नहीं हिंदुस्तान के लिए भी विषम परिस्थितियों का काल था। राजनैतिक चेतना के उदय और स्वाधीनता संग्राम के लिए गूंजने वाली तिलक और गांधी की वाणी को कविता के माध्यम से सर्व साधारण तक पहुंचाने का काम जिन कवियों ने अपना धर्म बनाया था। उनमेें सनेही का नाम सर्वोपरि है। सनेही उर्दू और फारसी के भी पंडित थे। उर्दू को जब एक अलग भाषा के रूप मेें मान्यता देने के लिए हिंदी के खिलाफ व्यूह रचना की गई तो अधिकारी प्रवक्ता के रूप मेें उन्होंने घोषणा की-
‘नहीं है तत्व कोई और इस उर्दू ढांचे में,
ढली है देखिये वह पूर्णता हिंदी के
सांचे में’।