Kisan Andolan and Agriculture Bill: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानून वापस लेने का ऐलान किया है। जल्द ही संसद में इसका प्रस्ताव भी लाया जाएगा। प्रधानमंत्री के इस ऐलान के बाद 'अमर उजाला' की टीम ने सीतापुर में जमीन से जुड़े किसानों की राय जानी। पढ़िए किसने क्या कहा?
तीनों कृषि कानूनों को लेकर जमीन से जुड़े किसान क्या सोचते हैं? बिल वापस होने पर किसान खुश हैं या नहीं? किसानों की अब क्या मांगे हैं? ऐसे ही तमाम सवालों के जवाब जानने के लिए 'अमर उजाला' की टीम सीतापुर में गन्ना किसानों के बीच पहुंची। ये वो किसान थे, जो चीनी मील पर अपना गन्ना बेचने आए थे।
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सैकड़ों की संख्या में मौजूद किसानों से जब कृषि कानून और आंदोलन के बारे में पूछा गया तो टीवी चैनलों की सुर्खियों से हटकर अलग ही जवाब सुनने को मिला। किसान संगठन से जुड़े नेताओं को छोड़कर ज्यादातर किसानों ने साफ कहा कि उन्हें न तो कृषि बिल से कोई लेना-देना है और न ही आंदोलन के बारे में पता है। किसानों ने कहा कि हम तो बस यही चाहते हैं कि आसानी से हमारी फसलें बिक जाएं। पढ़िए किसानों ने क्या-क्या कहा?
हमें आंदोलन या बिल से मतलब नहीं
कृषि कानून वापस लेने के ऐलान के बाद सीतापुर के किसानों ने प्रतिक्रियाएं दी।
- फोटो : अमर उजाला
खेती-किसानी करने वाले गंगा राम ने कहा, 'मुझे किसी आंदोलन के बारे में पता नहीं है। कानून की जानकारी भी नहीं है। हम तो बस ये चाहते हैं कि हमारा गेंहू, धान, गन्ना आसानी से बिक जाए। अभी इसे बेचने में काफी समस्याएं आ रही हैं। दो-दो दिन चीनी मील के बाहर लाइन लगाना पड़ता है।
किसान रामू ने कहा, 'कृषि बिल के बारे में जानकारी नहीं है। हां, ये सुना था कि कुछ किसान धरना दे रहे हैं।' जब रिपोर्टर ने कहा कि आज प्रधानमंत्री ने वो फैसला वापस ले लिया है तो रामू ने कहा कि अच्छी बात है।
बृजेश कुमार तिवारी ने भी आंदोलन या कृषि कानून की जानकारी न होने की बात कही। बोले- हमें तो अपना गन्ना बेचना है। मील में अभी 36 से 48 घंटे लगते हैं। तिवारी ने मोदी और योगी सरकार की तारीफ भी की। कहा- सरकार बहुत अच्छी है। मुझे सरकार से कोई दिक्कत नहीं है।
शिव मंगल सिंह ढोंगवा ने कहा, 'हमको तो केवल गन्ना बेचना है। बिल और आंदोलन से कुछ मतलब नहीं है। हमें राजनीति नहीं करनी है। हमें बस इतना चाहिए कि आसानी से हमारा गन्ना बिक जाए।
सात बीघे गन्ने की खेती करने वाले कौशल मिश्रा ने कहा कि इतना मालूम था कि कोई आंदोलन चल रहा है। बिल के बारे में कुछ नहीं मालूम है।
कानून वापसी की खुशी, लेकिन बिल के बारे में मालूम नहीं
कृषि कानून वापसी के ऐलान के बाद राय देते हुए किसान।
- फोटो : अमर उजाला
73 साल के शिवमंगल ने कहा कि उन्हें बिल के बारे में नहीं मालूम, लेकिन बहुत अच्छा लगा कि सरकार ने फैसला वापस ले लिया। शिवमंगल ने कहा कि किसानों के लिए सुविधाएं होनी चाहिए। अभी नहीं मिल रही है।
एक अन्य किसान ने कहा कि बिल वापस होने से किसानों को बहुत फायदा होगा। हालांकि, उन्होंने कहा कि वह किसी आंदोलन में नहीं गए थे। उन्हें कृषि कानूनों के बारे में ज्यादा जानकारी भी नहीं है।
शिवसेवक ने कहा कि किसानों को सिंचाई की सुविधा मिलनी चाहिए। खाद समय से मिलनी चाहिए। गन्ने की बुआई करने वाले पवन कुमार ने कहा कि किसानों को असुविधा हो रही है। किसानों को कोई सुविधा नहीं मिलती है। पवन को भी आंदोलन या कृषि बिल की कोई जानकारी नहीं थी।
धर्मेंद्र कुमार खुद आंदोलन में नहीं गए थे। लेकिन उन्होंने कहा, 'अब मोदी जी ने तो माफी मांग ली। अच्छा है। कृषि कानून कुछ किसानों को समझ में आया और कुछ को नहीं।'
कृषि कानून के वापसी का ऐलान होने के बाद प्रतिक्रिया देते हुए किसान नेता।
- फोटो : अमर उजाला
संयुक्त किसान मोर्चा के गुरुपाल सिंह ने कहा कि कृषि कानूनों की वापसी के फैसले से दिल में बहुत खुशी है। कुछ लोग हमें उग्रवादी कह रहे थे। अगर ये कृषि कानून काला नहीं था, तो प्रधानमंत्री ने वापस क्यों लिया? हम पर आरोप लग रहे थे कि फंडिंग विदेशों से हो रही थी। प्रधानमंत्री के इस फैसले से ये सब आरोप झूठे साबित हो गए। गुरुपाल सिंह ने आगे कहा कि अभी आंदोलन खत्म नहीं होगा। वह प्रधानमंत्री के ऐलान पर विश्वास नहीं कर सकते। हमारी मांग एमएसपी गारंटी की है। जब तक सरकार गारंटी नहीं देती है तब तक ये आंदोलन चलेगा।
गुरुसाहब सिंह ने कहा कि सरकार को बिल तो वापस लेना ही था। आज नहीं तो कल लेते, लेकिन इनके पास कोई और विकल्प नहीं था। ये किसान हित में बिल नहीं था। गुरुविंदर सिंह ने कहा कि कृषि बिल के वापस लेने के फैसले से खुशी है। अब आम किसानों को आसानी से एमएसपी मिलेगी। 40 बीघा खेती करने वाले गुरुसाहब सिंह कहते हैं कि उन्हें धान, गेहूं बेचने में काफी दिक्कतें आती हैं।
रंजीत सिंह ने कहा कि खुशी है कि तीनों काले कानून वापस लिए जा रहे हैं। 700 किसानों की कुर्बानी आज काम आई है। रंजीत ने आगे कहा कि कुछ लोग ये फैलाते हैं कि ये आंदोलन केवल सिखों का है। लेकिन ये झूठा है। आंदोलन सभी वर्ग के लोग शामिल हैं।