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सुनहरे अतीत वाले राजकीय विद्यालयों को अब गुरुजनों की दरकार 17-49-15

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सुल्तानपुर। 25 राजकीय माध्यमिक विद्यालयों में करीब 6500 बच्चे और 94 शिक्षकों पर इनके शिक्षण कार्य का दायित्व। मतलब एक शिक्षक पर करीब 70 बच्चों की तालीम की जिम्मेदारी है। शिक्षक भले ही किसी भी विषय के हों लेकिन गणित, विज्ञान, हिंदी, अंग्रेजी से लेकर इतिहास, भूगोल तक पढ़ाने की घंटावार खानापूरी उन्हें ही करनी है। जिले के राजकीय माध्यमिक विद्यालयों की फिलहाल यही स्याह तस्वीर है। ऐसे शैक्षिक परिवेश में शिक्षा की गुणवत्ता और यहां के छात्र-छात्राओं के भविष्य का अंदाजा स्वत: ही लगाया जा सकता है।
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नब्बे के दशक तक ‘जीआईसी’ शब्द शिक्षा की उच्च गुणवत्ता का मानदंड हुआ करता था। यह शब्द यहां अध्ययन करने वाले छात्रों की मेधा की तकरीबन गारंटी मान लिया जाता था। यहां के शिक्षकों की विशेष गरिमा होती थी। हाईस्कूल व इंटरमीडिएट की मेरिट में यहां के छात्रों का दबदबा होता था। समय गुजरने के साथ ही अन्य सरकारी सेक्टर की तरह इसके गौरव का भी क्षरण होता गया।
वर्तमान में जिले के राजकीय माध्यमिक विद्यालयों की दशा बेहद खराब है। जिले में कुल 25 राजकीय माध्यमिक विद्यालय हैं। इसमें शहर के राजकीय इंटर कॉलेज, केशकुमारी राजकीय बालिका इंटर कॉलेज, राजकीय बालिका इंटर कॉलेज कादीपुर, राजकीय इंटर कॉलेज महराजगंज, राजकीय इंटर कॉलेज भदैंया, राजकीय इंटर कॉलेज पिपरी को मिलाकर कुल छह इंटर कॉलेज हैं।
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इसके अलावा तीन पंडित दीनदयाल राजकीय मॉडल स्कूलों में भी इंटर तक की कक्षाएं संचालित हो रही हैं। अभिनव विद्यालय पन्ना टिकरी में सीबीएसई बोर्ड से इंटर तक की कक्षाएं संचालित होती हैं। शेष 15 राजकीय हाईस्कूल हैं। इन राजकीय माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों की कमी पठन-पाठन कार्य में सबसे बड़ी बाधा है।
जिले के राजकीय इंटर कॉलेजों में प्रवक्ता के कुल 109 पद स्वीकृत हैं। इनमें 27 पदों पर प्रवक्ता कार्यरत हैं जबकि 82 पद रिक्त हैं। सहायक अध्यापक के 234 पद स्वीकृत हैं, जिसमें 67 कार्यरत हैं और 167 पद रिक्त हैं। पंडित दीनदयाल राजकीय मॉडल इंटर कॉलेज में जीआईसी के शिक्षकों को संबद्ध कर व्यवस्था चलाई जा रही है।
वहीं, अन्य राजकीय माध्यमिक विद्यालयों में सेवानिवृत्त शिक्षकों को मानदेय पर रखकर व्यवस्था संचालित की जा रही थी। इस बार आवेदन मांगे गए हैं लेकिन अभी तक प्रस्ताव का नवीनीकरण नहीं हुआ। राजकीय हाईस्कूलों में कहीं एक तो कहीं दो शिक्षक ही हैं। कई विद्यालयों में तृतीय व चतुर्थ श्रेणी स्टाफ भी नहीं हैं।
इस हालत में बच्चे व उनके अभिभावकों का भी राजकीय माध्यमिक विद्यालयों से मोह भंग हो रहा है। स्ववित्त पोषित विद्यालयों की तुलना में शुल्क बेहद कम होने व वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होने पर ही मजबूरी में लोग यहां प्रवेश ले रहे हैं। पिछले 10 अगस्त तक इन राजकीय महाविद्यालयों में कुल 4979 बच्चे पंजीकृत थे, जो अब करीब 6500 हो गए हैं।
इस हिसाब से प्रवक्ता व सहायक अध्यापकों समेत कुल 94 शिक्षकों पर 6500 छात्र-छात्राओं के शिक्षण कार्य का जिम्मा है। मतलब करीब 70 बच्चों पर एक शिक्षक। ये शिक्षक भले ही किसी भी विषय के हों लेकिन वही सभी विषयों को पढ़ाने की खानापूरी करते हैं।
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