लंभुआ (सुल्तानपुर)। देश को आजादी दिलाने वालों में जिले के मुरली गांव निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शीतला प्रसाद सिंह का भी नाम अग्रणीय है। स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थन में उन्हें जेल भेज दिया गया था। अंग्रेजी हुकूमत की यातनाएं भी शीतला प्रसाद सिंह के हौसले को नहीं डिगा सकीं। बीमार होने के बाद भी अंग्रेजों ने जेल में उन्हें कड़ी सजा दी थी।
वर्ष 1907 में लंभुआ के समीप मुरली धारपुर गांव में भवानी प्रसाद सिंह के इकलौते पुत्र शीतला प्रसाद सिंह का जन्म हुआ था। शीतला प्रसाद की प्राथमिक स्तर की शिक्षा लंभुआ तथा कक्षा आठ की शिक्षा सुल्तानपुर में हुई। हाईस्कूल व इंटरमीडिएट की शिक्षा खपड़ाडीह फैजाबाद में हासिल की।
शीतला प्रसाद ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए तथा कलकत्ता विश्वविद्यालय से एमएम, एलएलबी डिग्री हासिल की। प्रदेश में वकालत करने के लिए उन्हें बीएचयू से एलएलबी डिग्री लेनी पड़ी। कलकत्ता में उनकी मुलाकात नेताजी सुभाष चंद्र बोस से हुई।
गांधीवादी विचारधारा होने के बावजूद शीतला प्रसाद सिंह को सुभाष चंद्र बोस का गहरा प्रभाव पड़ा। घर परिवार की जीविका चलाने के लिए शीतला प्रसाद ने सुल्तानपुर में वकालत करनी शुरू कर दी लेकिन उनका मन यहां नहीं लगा।
इस दौरान वे स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। वर्ष 1939 व 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्हें जेल की यात्रा करनी पड़ी। स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थन में शीतला प्रसाद सिंह को कई बार गिरफ्तार किया गया। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिरफ्तार किए गए शीतला प्रसाद को जिला कारागार में रखा गया। 12 नवंबर 1942 को इन्हें नजरबंद कैदी के रूप में केंद्रीय कारागार नैनी भेजा गया।
शीतला प्रसाद सिंह को उच्च श्रेणी का बंदी करार देते हुए पांच मई 1943 को केंद्रीय कारागार बरेली भेज दिया गया। दो दिसंबर 1943 को जेल से मुक्त किए गए। जेल में भी उनके ऊपर अंग्रेजों की यातनाएं चलती रहीं। तबीयत खराब होने पर चक्की न चला पाने पर उन्हें बेतों की मार खानी पड़ती थी। सात दिन उन्हें सांसत घर में रहना पड़ा।
इस दौरान उनके साथ पं. जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री व जिले के सेनानी गुरु प्रसाद सिंह भी थे। शीतला प्रसाद सिंह 1937 व 1946 में संयुक्त प्रांत के विधायक बने। बाद में उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी हुए। विधानसभा के डिप्टी स्पीकर भी रहे। पांच अप्रैल 1948 को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शीतला प्रसाद सिंह का निधन हो गया।
पत्नी को जारी हुई थी 50 रुपये मासिक पेंशन
लंभुआ। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शीतला प्रसाद सिंह के निधन के बाद उनके परिवार की माली हालत बिगड़ती गई। सरकारी सहायता के लिए उनकी पत्नी लक्ष्मी देवी अपने छोटे बेटे चितरंजन सिंह को लेकर दिल्ली गईं। विधायक प्रमाणपत्र के साथ वे गोविंद वल्लभ पंत से मिलीं। गोविंद वल्लभ पंत ने शीतला प्रसाद सिंह के बकाए भत्ते का भुगतान कराया और 50 रुपये मासिक पेंशन जारी कराया।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के चार पुत्र थे। सबसे बड़े हनुमान प्रसाद सिंह, बालमुकुंद सिंह, शत्रुघ्न सिंह व चितरंजन सिंह हैं। इनमें हनुमान प्रसाद सिंह व बाबलमुकुंद सिंह की मृत्यु हो चुकी है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की पत्नी लक्ष्मी देवी की भी मृत्यु हो चुकी है। मुरली धारपुर गांव में उनकी याद में एक भव्य गेट का निर्माण उनके छोटे पुत्र अवकाश प्राप्त शिक्षक चितरंजन सिंह ने करवाया है। इसके अलावा शासन की ओर से कीर्ति स्तंभ का निर्माण ब्लॉक परिसर में कराया गया है। स्तंभ के बगल शीतला प्रसाद सिंह की प्रतिमा भी उनके शिक्षक पुत्र ने लगवाई है।