यदि आपका बच्चा देर रात तक इंटरनेट से चिपका रहता है, चैटिंग के बिना उसे नींद नहीं आती तो इसे हल्के में मत लीजिए। अब वह मनोरोगी माना जाएगा।
अमेरिकन साइकेट्रिक सोसाइटी के डायग्नोस्टिक एंड स्टेटिकल मैनुअल में इंटरनेट एडिक्शन, सेक्सुअल एडिक्शन और साइबर सेक्स एडिक्शन को मनोरोग के रूप में शामिल गया है। मई के आखिरी सप्ताह में डीएसएम 5 को रिलीज किया जाएगा।
2003 में रिलीज हुए डीएसएम 4 में करीब 400 मनोरोग शामिल थे। सालों की रिसर्च के आधार पर तैयार डीएसएम 5 में इंटरनेट एडिक्शन, साइबर सेक्स एडिक्शन, सेक्सुअल एडिक्शन, लंबे समय तक शोक मनाने को मनोरोग की श्रेणी में जोड़ा गया है।
एसएन मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सा विभागाध्यक्ष डॉ. विशाल सिन्हा ने बताया कि अभी तक इन समस्याओं की कोई कसौटी नहीं है। डीएमएम 5 में जुड़ने के बाद रिसर्च होंगे और इनकी कसौटी तय की जाएगी।
टीन एजर्स और युवाओं का बड़ा तबका इंटरनेट एडिक्शन का शिकार है। हमारे पास टीन एजर्स के कई केस आते हैं लेकिन समस्या यह है कि उनके अभिभावक इसे बीमारी नहीं मानते हैं।
पर अब जबकि यह रोग की श्रेणी में शामिल होगा तो लोगों में जागरूकता आएगी। वे इसके प्रति सजग होंगे और मनोचिकित्सक से सलाह लेंगे।
सेक्सुअल एडिक्शन का मूल्यांकन करने से कई चीजें सामने आएंगी। बच्चियों के साथ बलात्कार करने वाले मनोरोग से ग्रस्त हो सकते हैं।
ये बदलाव भी
किसी प्रिय जन की मृत्यु के बाद इंसान टूट जाता है। कई केस में या तो वह रोता ही नहीं है या महीनों तक शोक में डूबा रहता है।
ऐसे मामलों को अब मनोरोग की श्रेणी रखा जाएगा और काउंसलिंग की जाएगी। बीमारी के शुरुआती लक्षणों में ही मरीजों को डायग्नोस कर इलाज किया जा सकेगा। सीजोफ्रेनिया के क्राइटेरिया में काफी बदलाव किए गए हैं।
मनोचिकित्सा की बाइबिल है डीएसएम
देश- दुनिया के चिकित्सक वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन के इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन आफ डिजीज (आईसीडी) और अमेरिकन साइकेट्रिक सोसाइटी के डीएसएम के आधार पर ही कार्य करते हैं।
डीएसएम मनोचिकित्सा की बाइबिल मानी जाती है। भारत में भी मनोचिकित्सा का आधार यही मैनुअल है।