देश की विद्युत आवश्यकताओं का 10 प्रतिशत उत्पादन इसी क्षेत्र से होता है। शामली में 284, बागपत 287, हापुड़ में 331 और गौतमबुद्धनगर में 381 राजस्व ग्राम होने के बाद भी जिले का दर्जा दे दिया गया, लेकिन दुद्धी को मानक पूरा न करने की दलील देना उचित नहीं है। प्रदर्शन में प्रेमचंद यादव, आई जेड खान, कुलभूषण पांडेय, राकेश श्रीवास्तव, रामजी पांडेय, उमेश गुप्ता, पी सी गुप्ता, वीरेंद्र, रेणु आदि शामिल रहे।
उत्तर प्रदेश के अंतिम छोर पर स्थित दुद्धी को अलग जिला बनाने की मांग लंबे समय से उठती रही है। दुद्धी प्रदेश की एकमात्र तहसील है, जिसकी सीमाएं तीन राज्यों को जोड़ती हैं। प्रदेश के राजस्व में भी दुद्धी तहसील का बड़ा योगदान है। आदिवासी बहुल आबादी वाला दुद्धी प्रदेश की अंतिम विधानसभा सीट भी है। अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित प्रदेश की दोनों विधानसभा सीटें भी इसी क्षेत्र के अंतर्गत आती हैं। बड़े भौगोलिक क्षेत्रफल, आदिवासी आबादी की बहुलता, पिछड़ापन, मुख्यालय से दूरी सहित अन्य कारणों के चलते यहां के लोग दुद्धी को अलग कर नया जिला बनाने की मांग करते आ रहे हैं। दुद्धी जिला बनाओ संघर्ष समिति के संयोजन में इस मांग के समर्थन में पिछले डेढ़ दशक से आंदोलन चल रहा है। हालांकि अब तक इस दिशा में कोई पहल नहीं हुई है।
लंबे समय से दुद्धी को जिला बनाने की मांग कर रहे लोगों की उम्मीदों को तगड़ा झटका लगा है। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल दुद्धी को जिला बनाने की कोई योजना नहीं है। इसके लिए अक्तूबर 1992 में जारी शासनादेश के तहत जिला बनाने के मानकों को पूरा न करने को कारण बताया गया है। स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित सपा के एमएलसी आशुतोष सिन्हा ने दुद्धी के प्रबुद्ध वर्ग की ओर से उठाए जा रहे इस मांग को पिछले दिनों विधानसभा में अतारांकित प्रश्न के रूप में उठाया था।
उन्होंने पूछा था कि क्या सोनभद्र की दुद्धी तहसील को जिला बनाने पर विचार किया जा रहा है, इसे कब तक जिला बनाया जाएगा। प्रश्न के जवाब में सरकार ने आयुक्त एवं सचिव राजस्व परिषद की ओर से 16 मई को जारी पत्र का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि 20 अक्तूबर 1992 को जनपद सृजन संबंधी शासनादेश में निर्धारित मानकों को दुद्धी तहसील पूरा नहीं करता। लिहाजा इसे जिला बनाना फिलहाल विचारणीय नहीं है। इस जवाब के बाद दुद्धी के लोगों में मायूसी छा गई है।