उनके सहभागी बने ओबरा के ही कलमकार नरेंद्र नीरव। दोनों ने गांवों में जाकर आदिवासियों को छोटी-छोटी बंधियां बनाकर जल संचयन के लिए प्रेरित किया। शुरुआती मुश्किलों के बाद महज कुछ वर्षों में ही श्रमदान की बदौलत डेढ़ दर्जन नई बंधियों का निर्माण हुआ तो कई पुरानी और जर्जर बंधियों को भी पुनरुद्धार से नया जीवन मिला। वर्षा जल संचयन से इलाके में न सिर्फ भूजल की कमी में सुधार हुआ है, बल्कि जनजीवन को भी बड़ी राहत मिली है। लोग इसी के सहारे खेती, पशुपालन सहित अन्य कार्य करते हैं।
श्रमदान से बंधी का निर्माण आसान नहीं था। मेहनत-मजदूरी से ही अपना जीविकोपार्जन करने वाले आदिवासियों के लिए यह बड़ी बात थी। नरेंद्र नीरव बताते हैं कि पहले तो मजदूर इसके लिए राजी नहीं थे। फिर अपने बच्चों के खुशहाल भविष्य के लिए वह आधा काम और आधा श्रमदान पर तैयार हुए। दस रुपये की मजदूरी से यह अभियान शुरू हुआ।
बड़े-बड़े पत्थरों को तोड़ने में दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद भी कभी 5 तो कभी 6 रुपये ही मिलते थे। फिर भी आदिवासी पीछे नहीं हटे। महिलाओं, बच्चों सहित हर वर्ग ने इस जल अभियान में हिस्सा लिया। डॉ. गुप्ता अपने पास से आधी मजदूरी वहन करते थे।
पत्थरों को चीरने का क्रम बढ़ता रहा और बंधी आकार लेती गई। कनहर और रेणु नदी के मध्य सलईबनवा, तेलगुड़वा, परासपानी के आसपास कई बंधियां इसी श्रमदान का नतीजा हैं। पानी से भरी रहने वाली इन बंधियों के आसपास पशुपालन, खेती-किसानी सहित कई कार्य बढ़ रहे हैं।
प्रदेश के मौजूदा मुख्य सचिव दुर्गाशंकर मिश्र तब नवसृजित जिले के डीएम होते थे। बंधियों के निर्माण में आदिवासियों के परिश्रम और लगन को देख आह्लादित डीएम ने डेढ़ लाख का सरकारी अनुदान देने का प्रयास किया। तब बंधी निर्माण से जुड़े लोगों ने इस दलील के साथ यह राशि लौटा दी कि सरकारी धन का हिसाब कौन रखेगा और फिर नए डीएम के आने पर उन्हें समझाएगा। इससे प्रभावित दुर्गाशंकर मिश्र ने इलाके में बंधी बनाने की कार्ययोजना को जिला योजना में शामिल कराया। सरकारी विभागों की मदद से कई अन्य बंधियों को संवारा गया।
डॉ. आरके गुप्ता
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सरकारी सेवा से निवृत्त होकर डॉ. गुप्ता अब ओबरा में ही क्लीनिक चलाते हैं। जल अभियान के दिनों को याद कर वह रोमांचित हो जाते हैं। उनके चेहरे की चमक मन की खुशी को जाहिर करती हैं। बताते हैं कि वनवासी सेवा आश्रम के बाबुल भाई से वनवासियों के लिए कुछ करने की प्रेरणा मिली। इस इलाके में बारिश खूब होती थी, फिर भी लोगों के लिए पानी सुलभ नहीं था।
हमने बस इसे संचय करने का तरीका समझाया। परियोजना के तमाम अभियंता मित्र थे। उनसे बंधी बनाने की तकनीकी जानकारी ली। हमने वही किया, जितना हमारा सामर्थ्य था। बाकी तो स्थानीय लोगों की मेहनत और हौसले ने पूरा कर दिया।
कठिनाई जरूर थी, लेकिन नीरव जैसे साथियों ने कभी महसूस नहीं होने दिया। आज पानी से भरी इन बंधियों और उनके आसपास तेजी से बढ़ते जनजीवन को देख मन आह्लादित होता है। उनका कहना है कि हर गांव में एक-दो बंधी बने तो पानी का संकट काफी हद तक दूर होगा।