भगवान राम के लिए कुर्सी न्यौछावर करने वाले और हिंदुत्व के प्रखर चेहरे की पहचान रखने वाले पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का सोनभद्र से गहरा रिश्ता रहा है। शनिवार की रात कल्याण सिंह भले ही शरीर त्याग कर अनंत लोक चले गए लेकिन वह हमेशा याद किए जाएंगे। मुख्यमंत्री रहते हुए कल्याण सिंह ने उद्योगपति के हाथों बिक चुकी डाला सीमेंट फैक्ट्री को वापस राज्य के स्वामित्व में लेकर, सोनभद्र के लिए भी एक नया इतिहास रच दिया था। हालांकि बाद की सरकारों ने डाला सीमेंट फैक्ट्री को निजी हाथों में सौंप दिया।
बता दें कि 1990 के दशक में जब सूबे की कमान मुलायम सिंह यादव ने संभाली तो घाटे में चल रही डाला सीमेंट फैक्ट्री को निजी हाथों में सौंपने का फैसला ले लिया। इसका सीमेंट फैक्ट्री कर्मचारियों ने पुरजोर विरोध किया। लंबे समय तक धरना-प्रदर्शन कर आवाज उठाई। दो जून 1991 को दोपहर 2:20 बजे धरने पर बैठे सीमेंट फैक्ट्री के कर्मियों और उनके परिवारी जनों पर पुलिस ने अपनी राइफलों का मुंह खोल दिया। गोलियों की आवाज के साथ ही पूरा बाजार चीख-पुकार से गूंज उठा। सरकारी आंकड़ों में उस गोलीकांड में मरने वालों की संख्या नौ दर्ज की गई है। आज भी डाला सीमेंट फैक्ट्री कर्मी और आसपास के रहवासी डाला में दो जून का दिन ‘शहीद दिवस’ के रूप में मनाते हैं। यहां स्थापित शहीद स्तंभ पर उस दु:ख की घड़ी को याद कर शांति पाठ करते हैं। इस गोलीकांड के बाद हिंदुत्व के मुद्दे पर जोर पकड़ने के कारण 24 जून 1991 को कल्याण सिंह पहली बार उत्तर प्रदेश के सीएम बने, लेकिन कल्याण सिंह एक साल, 165 दिन ही मुख्यमंत्री रह सके। छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढांचे के विध्वंस के बाद उनकी सरकार बर्खास्त कर दी गई। इसी के साथ ही उनका मुख्यमंत्री का सफर भी यहीं ब्रेक हो गया। जिस तरह से उन्होंने राम मंदिर के लिए अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी न्यौछावर कर दी थी। उसी तरह उद्योगपति के हाथों बिक चुकी डाला सीमेंट फैक्ट्री को वापस राज्य के स्वामित्व में लेकर, सोनभद्र के लिए भी एक नया इतिहास रच दिया था। उसके बाद की सरकारें इस निर्णय को बरकरार नहीं रख पाईं और फिर से डाला सीमेंट फैक्ट्री निजी हाथों में चली गई। फैक्ट्री के निजी हाथों में जाने के बाद बेरोजगार हुए सैकड़ों परिवारों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया। वर्तमान में स्थानीय अधिकांश युवक बेरोजगार पड़े हुए हैं।