इन गांवों की बात करें तो टंगापाथर, पुनर्वास महुअरिया, चकचैनपुर, बड़होर, झिल्लीमहुआ, चकचइरी ने ग्रामीणों को रिहंद जलाशय की स्थापना के तुरंत बाद बसा तो दिया गया लेकिन इन्हें जमीनों पर भौमिक अधिकार नहीं दिया गया। स्थिति यह है कि इन जमीनों पर कब्जा दखल होने के बावजूद खतौनी न होने की वजह से यहां के ग्रामीण न तो किसी की जमानत करा पाते हैं, और न ही इन जमीनों पर ऋण ले सकते हैं। रोजाना होने वाले विवाद का भी निपटारा नहीं हो पाता है।
बीते वर्षों में झिल्ली महुआ गांव में अनुसूचित जाति के परिवार ने जबरदस्ती कुछ लोगों की जमीन जोत दी। इस पर पुलिस ने विवाद के बाद चार लोगों के खिलाफ दलित उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज कर लिया। जमीनों पर मिले पट्टे के बावजूद वे मुकदमा लड़ रहे हैं और परेशान हैं। अनसर्वेड गांव होने की वजह से राजस्व कर्मियों की ओर से भी विवाद का निपटारा नहीं किया जाता है।
वनवासी सेवा आश्रम के कार्यकर्ता रहे डॉ. ब्रह्मजीत सिंह ने बताया कि 2009 में भारत सरकार की पहल पर मानवाधिकार आयोग की ओर से प्रो. के गोपाल अय्यर ने इन अनसर्वेड गांवों की मौके पर पड़ताल की और उसकी विस्तृत रिपोर्ट भारत सरकार को दी गई। इसके बावजूद अभी तक इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की गई है।
वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर तिवारी ने बताया कि रिहंद जलाशय की स्थापना के बाद वन विभाग द्वारा इन जमीनों का स्थानांतरण राजस्व विभाग को तो कर दिया गया लेकिन वह कागज पर नहीं हो सका। राजस्व विभाग ने भी इन जमीनों को अपना मानते हुए गवर्नमेंट ग्रांट का पट्टा बांट दिया।