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ट्रक ड्राइवर दौड़ा रहे एंबुलेंस, सांसत में मरीज

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प्रसव पीड़िता को गंभीर हालत में ऑटो रिक्शा से लाया गया जिला महिला अस्पताल। (संवाद) - फोटो : SITAPUR
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समय से नहीं मिली एंबुलेंस
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खैराबाद विकासखंड के मासूमपुर निवासी पूजा के सीने में दर्द हो रहा था। तेज बुखार आ रहा था। परिजनों ने एंबुलेंस सेवा शुरू होने पर फोन किया। जब एक घंटे बाद भी एंबुलेंस नहीं पहुंची तो परिजन ऑटो से पूजा को लेकर अस्पताल गए। लहरपुर के बिलरिया निवासी रामगुलाम के पैर में चोट लग गई थी। इनको भी समय से एंबुलेंस नहीं मिल पाई।
करते रह गए इंतजार
तंबौर इलाके की सुनीता जिला महिला अस्पताल में भर्ती थी। इनको गुरुवार को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया। इस पर इन्होंने एंबुलेंस को फोन किया। लेकिन एंबुलेंस नहीं मिली। परिजन निजी साधन से घर लेकर गए। सुनीता ने बताया, करीब दो घंटे तक अस्पताल में इंतजार करते रहे।
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एंबुलेंस के अभाव में बिगड़ी हालत
दौलतपुर बिजवार निवासी गायत्री को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। इस पर परिजनों ने एंबुलेंस को फोन किया। परिजनों का कहना है कि करीब ढाई घंटे तक एंबुलेंस आने का इंतजार करते रहे। जब एंबुलेंस नहीं मिली तो वह ऑटो से ही जिला महिला अस्पताल पहुंची। इस दौरान अस्पताल आते-आते गायत्री की काफी तबियत बिगड़ गई।
सीतापुर। एंबुलेंस कर्मियों की हड़ताल के चलते भले ही जिला प्रशासन ने एंबुलेंस दूसरे ड्राइवरों से चलवा दिया हो, लेकिन यह सेवा पटरी पर आने की बजाए और बिगड़ गई है। इससे पहले ये ड्राइवर ट्रक, बस, ऑटो रिक्शा आदि चलाते थे। अब ये सब एंबुलेंस चालक बन गए है। न तो ट्रेनिंग मिली है न ही उनको अस्पताल में भर्ती कराने का तौर तरीका सिखाया गया है।
ऐसे में यह केवल ड्राइवर की भूमिका में वाहन तो चला रहे हैं, लेकिन मरीजों को एंबुलेंस व अस्पताल के बीच कठिन समय में दी जाने वाली सुविधाओं की जानकारी न होने से मरीजों की जान पर आफत बन रही है। एआरटीओ ने ड्राइवरों का इंतजाम करके सड़कों पर एंबुलेंस दौड़ा दी है। यह एंबुलेंस मरीजों के लिए कितनी असरदार हुई, इसकी रियलटी गुरुवार को अमर उजाला टीम ने जिला व महिला अस्पताल आने वाले मरीजों से बातचीत करके परखी।
अस्पताल आने वाले मरीजों ने बताया कि एक से दो घंटे तक एंबुलेंस का इंतजार करते रहे। एंबुलेंस नहीं आई। जब कंट्रोल रूम को दोबारा फोन किया तो उधर से कोई सही जवाब न देकर बस आने की ही बात कही जाती रही। ऐसे में लोग अपने निजी वाहन से अस्पताल पहुंचे। इससे उन्हें काफी अधिक रुपये खर्च करने पड़े।
यही हाल अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद घर जाने वाले मरीजों का भी रहा। यह लोग भी एंबुलेंस की सुविधा का लाभ नहीं उठा सकें। मरीजों ने कहा कि केवल कागजों पर ही एंबुलेंस दौड़ाई जा रही है। जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। फोन करने के बाद भी एंबुलेंस नहीं आती है।
हाल ये है कि मरीजों को एक से दो घंटे इंतजार के बाद भी एंबुलेंस नहीं मिल रही है। कंट्रोल रूम से एंबुलेंस के बारे में सही जानकारी नहीं दी जा रही है। बस इंतजार करने की बात कहकर मरीजों को परेशान किया जा रहा है। गुरुवार को जिला व महिला अस्पताल में तमाम मरीज अपने निजी साधनों से पहुंचे।
इन मरीजों ने बताया कि फोन करने के बाद भी जब वाहन नहीं आया तो तबियत बिगड़ने पर खुद के खर्च पर वाहन लेकर यहां आए। इससे लोग एंबुलेंस के अभाव में दिनभर परेशान रहे। एंबुलेंस कर्मी ठेका प्रथा बंद करने सहित अन्य मांगों को लेकर हड़ताल कर रहे है।
साहब, हम नहीं चलाएंगे एंबुलेंस
पिसावां सीएचसी की एंबुलेंस चलाने गए सुनील व बृजेश कुमार ने एंबुलेंस की चाभी व सीयूजी नंबर सीएचसी अधीक्षक को सौंप दिया है। इन दोनों ड्राइवरों ने कहा कि हम लोगों को सीएमओ ऑफिस से एंबुलेंस चलाने के लिए भेजा गया था लेकिन हम लोग एंबुलेंस नहीं चला पाएंगे। इसलिए हम लोग अपनी स्वेच्छा से इसकी चाभी सौंप रहे हैं।
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20 मिनट एंबुलेंस में बंद रहा मरीज
एक एंबुलेंस महोली इलाके के महसुनिया निवासी कल्लू सिंह को लेकर जिला अस्पताल पहुंची थी। ड्राइवर जिला अस्पताल में एंबुलेंस खड़ी कर पर्चा लेकर पूरे अस्पताल में दौड़ता रहा। ड्राइवर सुरेंद्र को अस्पताल में मरीजों को भर्ती कराने की प्रक्रिया नहीं मालूम थी। इस दौरान कल्लू सिंह एंबुलेंस के अंदर ही करीब 20 मिनट तक बंद रहे। ड्राइवर को स्ट्रेचर भी नहीं मिला। जबकि कल्लू सिंह की सांस फूल रही थी। सुरेंद्र ने बताया, हम तो पहले ट्रक चलाते थे। अब एंबुलेंस चलाने के लिए कोई ट्रेनिंग तो दी नहीं गई है। इसी वजह से दिक्कतें आ रही है।
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