नैमिषारण्य। पितृ विसर्जन अमावस्या पर 10 अक्तूबर को पितरों को श्रद्धा भाव से विदाई दी जाएगी। इसके साथ ही 15 दिन से चल रहे पितृ पक्ष का समापन हो जाएगा। इस अवसर पर पितरों की मुक्ति के लिए तर्पण और पिंडदान करने देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु नैमिषारण्य पहुंचेंगे। चक्रतीर्थ और आदि गंगा गोमती में स्नान के बाद श्रद्धालु धार्मिक अनुष्ठान और कर्मकांड करेंगे।
पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए इस अमावस्या का विशेष महत्व है। नैमिष तीर्थ को नाभि गया के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि यहां पितरों की तृप्ति के लिए पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण करने से विशेष फल प्राप्त होता है।
प्राचार्य प्रभाकर द्विवेदी ने बताया कि अमावस्या तिथि नौ अक्तूबर की रात 9:35 बजे शुरू होकर 10 अक्तूबर की रात 9:19 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार 10 अक्तूबर को सर्वपितृ अमावस्या मनाई जाएगी। उन्होंने बताया कि इस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराने और दान देने से पितरों की तृप्ति होती है। मान्यता है कि पितर अपने वंशजों को आशीर्वाद देकर विदा होते हैं।
जिन परिवारों को अपने पितरों की मृत्यु तिथि याद नहीं है या किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाया है, वे इस अमावस्या पर श्राद्ध कर सकते हैं। मान्यता है कि इस दिन श्राद्ध करने से पितर संतुष्ट होते हैं। अकाल मृत्यु को प्राप्त लोगों का श्राद्ध भी इस दिन किया जा सकता है।
पितरों का मार्ग आलोकित करने के लिए जलाते हैं दीपक
महंत विवेक शास्त्री ने बताया कि पितृ विसर्जन अमावस्या को पितृ पक्ष का समापन पर्व भी कहा जाता है। इस दिन शाम को दीपक जलाकर दरवाजे पर पूड़ी, पकवान और अन्य खाद्य पदार्थ रखे जाते हैं। मान्यता है कि इससे पितरों की विदाई के समय उनके भूखे न रहने की कामना की जाती है। दीपक जलाने का आशय पितरों के मार्ग को प्रकाशमान करना है। इस दिन नदी या सरोवर के तट पर अथवा घर में भी श्राद्ध किया जा सकता है। मान्यता है कि अमावस्या पर किया गया श्राद्ध परिवार के सभी पूर्वजों की आत्माओं की तृप्ति के लिए पर्याप्त होता है।
पीपल के पेड़ की करें पूजा
आचार्य रमेश द्विवेदी ने बताया कि पितृ अमावस्या पर पीपल के वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन सुबह जल्दी उठकर पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाकर पूजन करना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इससे पितर प्रसन्न होते हैं और परिवार को आशीर्वाद देते हैं।