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जिला अस्पताल में प्यास लगी तो खर्च करने पड़ेंगे बीस रुपये

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जिला अस्पताल में प्यास लगी तो खर्च करने पड़ेंगे बीस रुपये
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सिद्धार्थनगर। इलाज के लिए एक रुपये की पर्ची पर काम चल जाता है, लेकिन प्यास बुझाने के लिए 20 रुपये मरीज और तीमारदार को खर्च करने पड़ रहे हैं। यह हाल माधव प्रसाद त्रिपाठी से संबद्ध जिला अस्पताल का है। यहां आने वाले मरीज को प्यास बुझाने के लिए रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। जिला अस्पताल में पेयजल उपलब्ध कराने की व्यवस्था चरमरा गई है, लेकिन जिम्मेदार बेखबर हैं।
अप्रैल की कड़ाके की धूप और पछुआ हवा से हलक सूख रहा है। हर समय पानी की जरूरत है, लेकिन माधव प्रसाद त्रिपाठी से संबद्ध जिला अस्पताल में पेयजल व्यवस्था बदहाल है। अस्पताल में शीतल पेयजल की व्यवस्था नहीं है। अस्पताल के बाहर पानी के लिए वॉटर टैंक लगा हुआ है, लेकिन तपती धूप में वह भी गर्म हो जा रहा है। परिसर में लगे हैंडपंप की स्थिति ठीक नहीं है। ऐसे में अस्पताल में आने वाले मरीजों को प्यास लगने पर बाहर से पानी की बोतल खरीदनी पड़ रही है।
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एक रुपये की पर्ची पर उपचार और दवाएं मरीजों को मिल जा रही हैं, लेकिन इस गर्मी में सूखते हुए गले को तर करने के लिए जरूरतमंदों को रकम खर्च करनी पड़ रही है। जिला अस्पताल के आकस्मिक चिकित्सा कक्षा में पिता को लेकर गए ओमप्रकाश मंगलवार को पानी की बोतल लेकर आते हुए दिखे। उन्होंने बताया कि अस्पताल में शीतल पेयजल की व्यवस्था नहीं है। इस लिए बाहर से 20 रुपये खर्च करके पानी की बोतल लानी पड़ रही है। रामस्नेही ने कहा कि रात में बच्चे को लेकर आए थे, उसे उल्टी-दस्त की शिकायत थी। बच्चा तो ठीक हो गया, लेकिन पानी के लिए परेशान हो जाना पड़ा। तीन बार बाहर जाकर पानी खरीदकर लाना पड़ा। बाहर जो टंकी है, उसका पानी गर्म आता है। इस लिए बाहर से पानी खरीदना पड़ता है। इस पर ध्यान देने की जरूरत है। ऐसी कई मरीजों की पीड़ा है, लेकिन जिम्मेदार बेखबर हैं।
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ओपीडी में बड़ी संख्या में आते हैं मरीज
माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज से संबद्ध जिला अस्पताल में सोमवार और मंगलवार को ओपीडी में 1200-1500 लोग पहुंचते हैं। बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार, शनिवार को 900-1200 मरीज आते हैं। एक मरीज को पर्ची कटाने, चिकित्सक को दिखाने और जांच कराने में चार से पांच घंटे का समय लगता है। ऐसे में उसे कई बार पानी की जरूरत पड़ेगी। उन्हीं के साथ आकस्मिक चिकित्सा कक्ष, सामान्य भर्ती कक्ष, शल्य चिकित्सा कक्ष, स्त्री एवं प्रसूति रोग कक्ष, डायलिसिस यूनिट में कुल मिलाकर 500 से अधिक मरीज रहते हैं। अब गर्मी में पानी नहीं है। ऐसे इतनी संख्या में आने वाले मरीजों पर क्या बीतता होगा, यह समझा जा सकता है।
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