श्रावस्ती। पांच पैसे की लूट ने दो लोगों को 24 वर्ष की कारावास की सजा दिलाई थी। यह सजा इतिहास के पन्नों में सबसे कठोरतम सजा में शामिल है। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान इकौना में घटित इस घटना का साक्षी संपूर्ण देश बना। इस सजा की निंदा भी कई बड़े मंचों पर हुई।
आजादी ऐसे ही नहीं मिली। इसके लिए पूर्वजों को अपना लहू देना पड़ा। आजादी के इस आंदोलन में जिले की भूमिका प्रदेश के अन्य हिस्सों से ज्यादा महत्वपूर्ण थी। कई मामले तो ऐसे सामने आए जब आजादी के संघर्ष के मामले में श्रावस्ती क्षेत्र का नाम विश्व पटल पर भी उभर कर सामने आया। ऐसा ही एक मामला जो इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों से दर्ज है। मामला भारत छोड़ो आंदोलन (सन 1942) का है। उस समय पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन चल रहा था। ऐसा ही आंदोलन मौजूदा श्रावस्ती जो उस समय बहराइच जनपद का हिस्सा हुआ करता था। यहां भी चल रहा था।
अंग्रेजों के सामने अपना विरोध दर्ज कराने के लिए बहराइच के महराजा सिंह हाईस्कूल में हड़ताल करने का एक असफल प्रयास हुआ। लेकिन जब वहां सफलता नहीं मिली तो श्रावस्ती के भगवानपुर में आजादी के दीवानों ने डाक लूटने का प्लान बनाया। उस समय जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वामी दयाल, रामसुंदर व मुटरू ने तीन फरवरी 1943 में भगवानपुर गांव के पास ही आ रहे डाकिए की डाक लूट ली। इस डाक लूट के समय डाकिए के बोरे में केवल पांच पैसा व कुछ पत्र थे। जिसे तीनों लोगों ने निकट के एक कुएं में डाल दिया था।
इस मामले में अंग्रेज पुलिस ने तीनों लोगों को गिरफ्तार कर लिया था। इस पर 09 फरवरी 1943 को ही इन्हें इस लूट के लिए 24 वर्ष कारावास की सजा सुनाई गई। इस सजा के बाद 10 मार्च 1943 को हुए अपील में सुंदर लाल छूट गए थे। जबकि मुटरू व स्वामी दयाल की सजा दस वर्ष कर दी गई थी। अब तक के इतिहास में यह सबसे कठोर सजा मानी जा रही है। जिसे इन आंदोलनकारियों को भुगतना पड़ा था। इसी के साथ ही बहराइच के पयागपुर में भी आंदोलनकारियों ने सरकारी यातायात में बाधा डालने के उद्देश्य से चिल्वरिया के पास रेलवे लाइन का तार काट दिया गया था। इसके अलावा बहराइच के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अमर सिंह निवासी समिरांवा पयागपुर ने विशेश्वर गंज स्टेशन जो उस समय नया नया बना था। वहां कांग्रेस का तिरंगा लहरा कर आजादी के नारे लगाए थे।
सभी स्वतंत्रता आंदोलन में श्रावस्ती था प्रमुख पड़ाव
स्वतंत्रता आंदोलन के सभी चरणों में श्रावस्ती एक प्रमुख पड़ाव के रूप में था। यह बात अलग थी कि उस समय यह जनपद बहराइच का एक हिस्सा हुआ करता था। लेकिन यदि आंदोलन व स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की संख्या पर निगाह डाली जाए तो संयुक्त जनपद में भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की संख्या श्रावस्ती में ज्यादा थी। यही कारण था कि यहां सभी आंदोलन का केंद्र बिंदु रहा। जबकि विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार हो रहा था। तो भिनगा में पंडित श्रीराम त्रिपाठी व यदुनाथ प्रसाद दीक्षित के नेतृत्व में 25 स्वयं सेवकों का एक जत्था पिकेटिंग के लिए अपना केंद्र बनाया था।
इन आंदोलनकारियों को अंग्रेज पुलिस ने पीट पीट कर नगर से बाहर खदेड़ दिया था। यह जत्था कई बार भिनगा में पिकेटिंग के लिए आता था। इनमें कइयों को सजा के साथ आर्थिक दंड भुगतना पड़ा। यहां तक कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 07 अक्तूबर 1931 को सोनवा, गिलौला व इकौना में एक जोरदार भाषण दिया था। जिसमें तात्कालिक रियासतों को चेतावनी दी थी कि वह किसानों का शोषण बंद कर दें। अन्यथा एक एक रियासत की ईंट उखाड़ दी जाएगी।