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बसपा की सूची ने बदला सपा-भाजपा का चुनावी समीकरण

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श्रावस्ती। बसपा ने जिले की दोनों विधानसभा सीटों के लिए प्रत्याशियों के नाम की घोषणा कर दी है। पार्टी ने भिनगा से दद्दन खां और श्रावस्ती से नीतू मिश्रा पर जीत का दावं लगाया है। बसपा प्रत्याशियों के नाम के ऐलान से इन दोनों ही सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटी सपा व भाजपा के चुनावी समीकरण में भी फेरबदल होना तय हो गया है। जिले की दोनो विधानसभा सीटों पर पांचवें चरण में चुनाव होना है। सपा व भाजपा दोनों ने अभी तक इन सीटों के प्रत्याशियों के नाम की घोषणा न कर अपने पत्ते बंद रखे हैं। मंगलवार को बसपा ने सबसे पहले इन दोनों सीटों पर अपने प्रत्याशियों के नाम की घोषणा कर सबको हैरत में डाल दिया। चुनाव मैदान में उतरने वाले इन दोनों ही प्रत्याशियों के नामों की घोषणा से दोनों ही सीटों के जातिगत समीकरण भी बदले नजर आने लगे हैं।
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भिनगा विधानसभा सीट की बात करें तो यहां सबसे अधिक वोटर अल्पसंख्यक समुदाय के हैं। इनमें भी पठान बिरादरी सर्वाधिक है। दूसरे नंबर पर कबाड़िया (राइनी) व अन्य जातियां है। यदि संख्या के आधार पर देखे तो भिनगा विधानसभा में अल्प संख्यकों की संख्या 23.21 प्रतिशत है। इसके बाद ब्राह्मण 12.77 प्रतिशत, यादव 11.94 प्रतिशत, कुर्मी 9.68, अनुसूचित जाति में चमार 5.06, पासी 4.57 व कोरी 2.14 प्रतिशत है। इससे पूर्व हुए विधानसभा चुनावों में अल्पसंख्यक समुदाय सपा या फिर बसपा के साथ ही रहा है। अल्पसंख्यक का वोट भाजपा को नाम मात्र का ही मिलता रहा है। ब्राह्मण सहित अन्य पिछड़ा वर्ग का अधिकांश वोट भाजपा के पक्ष में जाने के कारण ही जातिगत समीकरण में वह सपा बसपा पर भारी पड़ता है। वर्तमान में जितने भी प्रत्याशी सभी दलों के टिकट मांग रहे हैं उनमें बसपा द्वारा घोषित दद्दन खां ही एक मात्र ऐसे प्रत्याशी हैं जो अल्पसंख्यक व बसपा के काडर वोट पर अपना दावा रखते हैं। वर्ष 2017 के चुनाव में भी यही समीकरण बना था। जिसमें बसपा के असलम रायनी को जीत मिली थी।
श्रावस्ती विधानसभा में बसपा ने नीतू मिश्रा पर दांव लगाया है। यदि जातिगत समीकरण को देखे तो यहां ब्राह्मणों के करीब 98 हजार व अनुसूचित जाति के 54 हजार के करीब वोट हैं। ऐसे में देखा जाए तो यह समीकरण 1.40 लाख के ऊपर पहुंच जाता है। इससे भाजपा व सपा दोनों का ही चुनावी गणित बिगड़ सकता है। वर्ष 2017 में इस सीट से भाजपा का ब्राह्मण प्रत्याशी ही चुनाव जीता था। उस समय बसपा का गैर ब्राह्मण उम्मीदवार होने के बावजूद उसे करीब 53 हजार वोट मिले थे और भाजपा प्रत्याशी मात्र 445 वोटों से जीत हासिल कर पाया था। इस बार बसपा की तरफ से ब्राह्मण प्रत्याशी को ही मैदान में उतारे जाने से भाजपा व सपा दोनों के लिए चुनावी जीत की राह काफी चुनौती भरी हो गयी है।
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