शामली। यूपी विधानसभा चुनाव में सरकारी कर्मचारियों की पुरानी पेंशन का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, बिजली, खेती-किसानी आदि मुद्दों के बीच प्रदेश में इस बार यह मुद्दा भी है। यह एक ऐसा मुद्दा है, जिससे सीधे तौर पर राज्य के करीब 28 लाख कर्मचारी, शिक्षक और पेंशनर्स जुड़े हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सपा की सरकार बनने पर पुरानी पेंशन बहाल करने का वादा किया है। जबकि प्रदेश के मुख्य सचिव दुर्गा शंकर सिंह नई पेंशन योजना के फायदे गिना रहे हैं। जिले में करीब 14 हजार सरकारी कर्मचारी हैं। इन सरकारी कर्मचारियों की क्या है इस मुद्दे पर क्या है राय, आइए जानते हैं...हिंदू कन्या इंटर कॉलेज के लिपिक संजीव पंवार का कहना है कि 2005 के बाद सरकारी भर्तियों में पेंशन खत्म कर दी गई। नई पेंशन नीति कर्मचारी हित में नहीं है। पुरानी पेंशन व्यवस्था को बहाल किया जाए। इसके लिए हम दस साल से आंदोलन करते आ रहे हैं। अखिलेश यादव जो वादे कर रहे हैं, इसे सोच-समझकर ही मतदान किया जाएगा।
फार्मासिस्ट एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष उमाशंकर भट्ट का कहना है कि पुरानी पेंशन बहाली की मांग को जो राजनीतिक दल अपने घोषणा पत्र में शामिल करेगा उस राजनीतिक दल का साथ देंगे।
जैन कन्या इंटर कॉलेज के लिपिक मनीष जैन का कहना है कि पुरानी पेंशन का मुद्दा कर्मचारियों के भविष्य से जुड़ा है। इस मुद्दे पर गहनता से विचार करके ही इस बार कर्मचारी चुनाव में मतदान करेंगे।
फार्मासिस्ट प्रवीण कुमार का कहना है कि सरकार नई पेंशन योजना को बेहतर बता रही है, लेकिन ऐसा नहीं है। पुरानी पेंशन योजना की बहाली कर्मचारी हित से जुड़ा सबसे बड़ा मुद्दा है। जिसे किसी भी राजनीतिक दल को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। जो भी ऐसा करने की गलती करेगा, उसे चुनाव में नुकसान होना तय है।
नगर पालिका के वरिष्ठ लिपिक प्रदीप कुमार का कहना है कि पुरानी पेंशन योजना ही कर्मचारी हित में है। हम पुरानी पेंशन के दायरे में हैं, लेकिन फिर भी 2005 के बाद भर्ती हुए कर्मचारियों के हम साथ हैं। राजनीतिक दलों को यह मुद्दा अपने घोषणा पत्र में शामिल करना चाहिए। जो भी यह काम करेगा, उसे चुनाव में लाभ मिलेगा।
फार्मासिस्ट संजीव शर्मा का कहना है कि पुरानी पेंशन योजना की बहाल कराने को कर्मचारी 10 वर्षों से आंदोलनरत हैं। इन सालों में सपा और भाजपा की सरकार प्रदेश में रही है। दोनों ही सरकारों में कर्मचारियों की इस मांग को कोई महत्व नहीं दिया गया। अब चुनाव में फिर से इस मुद्दे को उठाया जा रहा है। कर्मचारी इस पर नजर बनाए हुए हैं।