शामली। एक तरफ लॉकडाउन तो दूसरी तरफ मौसम की मार से सब्जी उगाने वाले किसान मायूस है। महंगा बीज, दवा, खाद, पानी के साथ मेहनत से सब्जी उगाई। मंडी में सब्जी के न तो उचित दाम मिले और न ही उत्पादन अच्छा हुआ। इसके चलते लागत भी नहीं निकल पाई। मजबूरी में खीरे की फसल को जोतना पड़ा। खीरे की फसल की लागत करीब 10 हजार आई जबकि पांच हजार रुपये के बिके।
दोपहर के करीब 12 बजे का समय था। गांव मुंडेट कलां निवासी सतीश कुमार गर्मी में मुरझाई सब्जी के खेत में पानी चला रहा था। उन्होंने बताया कि 7500 रुपये के हिसाब से छह बीघा खेत ठेके पर सब्जी बोने के लिए लिया हुआ है। तीन बीघा में तुरई, भिंडी और लौकी की फसल मार्च में बाई थी। फसल में बीज, दवा, खाद, पानी और मजदूरी समेत करीब 13 हजार रुपये से ज्यादा की लागत आई। जब फसल तैयार हुई तो मंडी में भाव नहीं मिला। मंडी में लौकी तीन से पांच रुपये किलो, तुरई 10 से 13 रुपये और भिंडी चार रुपये किलो बिकती है। पहले तो लौकी को खरीदने वाला ही नहीं मिला था। बार-बार बे-मौसम बारिश से उत्पादन भी काफी कम है। इसके चलते एक दिन में मुश्किल से 200 से 250 रुपये की सब्जी बिकती है। अभी तक करीब 2000 रुपये की सब्जी बिकी है। लागत भी मुश्किल से पूरी होगी। पिछले साल भिंडी, लौकी और तुरई के दाम इस साल के मुकाबले चार गुना से भी अधिक थे। सतीश ने बताया परिवार में उसके अलावा पत्नी और मां है। घर का खर्च मुश्किल से जैसे तैसे कर चला रहे हैं।
मजबूरी में खीरे की फसल जोतनी पड़ी
सतीश ने बताया कि उसने तीन बीघा में खीरा बोया था। मंडी में खीरे का भाव नहीं मिला। बारिश में खीरे की फसल गल गई। फरवरी में बारिश में दो बार बीज खराब हुआ। करीब 10 हजार की लागत आई थी और फसल करीब पांच हजार रुपये की ही बिकी थी। मजबूरी में खीरे की फसल की जुताई करनी पड़ी। गोभी की फसल लगाने की इच्छा था, लेकिन गोभी की भी डिमांड न होने के कारण उसने ज्वार (हरा चारा) की फसल बोई है। यही हाल आलू की फसल का हुआ था। बारिश में आलू खेत में ही सड़ गया था। तीन बीघा में जहां 50 बोरे आलू होता था, वहां मुश्किल से 10 बोरे आलू हुआ था। आढ़ती से 10 हजार रुपये उधार लिए थे। वह किसी तरह से पूरे हुए। अब दूसरी फसल बोने के लिए फिर उधार लेना पड़ेगा। कुल मिलाकर इस साल फसलों में नुकसान ही चल रहा है।
नौ बीघा खेत में हुई चार क्विंटल मूली
गांव हसनपुर लुहारी निवासी अरविंद सैनी ने बताया इस साल मैंने नौ बीघा खेत में मूली की फसल लगाई थी। एक बीघा फसल में करीब सात हजार रुपये का खर्च आया शुरूआत में फसल अच्छी चल रही थी, लेकिन लगातार बारिश आने के कारण मूली की फसल में काफी नुकसान होता चला गया। जब तक फसल तैयार हुई तो अधिकांश मूली नष्ट हो गई। नौ बीघा खेत में सिर्फ तीन से चार कुंतल मूली ही निकल पाई। इस फसल में लगभग 50 हजार रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ है।
दाम न मिलने पर फसल को नष्ट कर दिया
कांधला के मोहल्ला खैल निवासी किसान मयंक सैनी ने बताया कि उसने छह बीघा भूमि पर भिंडी की खेती करते है, लेकिन जो फसल मंडी में 40 से 50 रुपये किलो तक बिकती थी, वह इस बार चार से आठ रुपये किलो तक बिक रही है। इस फसल को तैयार करने से लेकर मंडी तक ले जाने मे करीब सात रुपये किलो का खर्च आ जाता है। फसल के वाजिब दाम न मिल पाने के कारण कुछ फसल को तो खेत में नष्ट कर दिया है। अब उम्मीद नहीं है कि फसल के सही दाम मिल पाएंगे। आढ़ती से दस हजार और दवा के 20 हजार रुपये अभी उधार है।
तीन बीघा सब्जी की बुआई में लागत
बीज : 5000 रुपये
दवा : 2000 रुपये
खाद : 1200
मजदूरी : 2500 रुपये
पानी : 1000 रुपये
खेत की जुताई : 1200 रुपये
मंडी में ये मिल रहे दाम
तुरई : 10 से 13 रुपये किलो
भिंडी : 4 रुपये किलो
लौकी : 3 से 5 रुपये किलो