शाहजहांपुर। शनिवार दोपहर को आए एक फोन से कांट का भंडेरी गांव को शोक में डुबो दिया। हापुड़ की पटाखा फैक्टरी में हुए धमाके में इस गांव के कई लोगों के हताहत होने की सूचना मिलते ही परिजन वहां रवाना हो गए। कई घरों में रोने-बिलखने की आवाज आ रही हैं। इस वजह से रविवार को बहत से घरों में चूल्हे तक नहीं जले। मृतकों के घरों के आसपास ग्रामीण इकट्ठा थे। अपनों को खोने की आशंका में पूरे गांव में शोक व्याप्त है।
सुबह होते ही लोगों तक दुर्घटना में जान गंवाने वालों की खबरें आने लगीं। हालांकि अभी तक अधिकतर लोगों को यह पता नहीं चल रहा है कि वास्तव में वहां क्या हुआ...उनके अपने जिंदा हैं या दुनिया में नहीं रहे। अपनों की सलामती के लिए भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं। शाहजहांपुर-जलालाबाद रोड पर कांट कस्बे से करीब 13 किलोमीटर आगे चलने पर एक रास्ता भंडेरी गांव की ओर जाता है। मुख्य सड़क से दो किलोमीटर दूर पांच हजार की आबादी वाला गांव भंडेरी है। टूटी-फूटी सड़क के किनारे के मकानों से रोने-चीखने की आवाज आ रही थी।
जिस घर का सदस्य हादसे का शिकार हुआ है, उसके मकान के बाहर भीड़ जमा थी। बाहर चबूतरे पर पड़ोसी महिलाएं परिवार की महिलाओं के साथ सुबक रहीं थीं। सर्वेश के पिता पप्पू, मां और दो छोटी बहनें अधकच्चे मकान के दरवाजे पर फूट-फूटकर रो रही थीं। पड़ोसी ढांढस बंधाने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन इकलौते बेटे को खोने वाले माता-पिता को समझाते वक्त अपने आंसू भी नहीं रोक पा रहे थे।
हालांकि लोग दिलासा दे रहे थे कि हो सकता है सर्वेश को कुछ न हुआ हो। वहां से कुछ फासले पर रामू का घर है। घर पर केवल चचेरी भाभी और पांच महीने की गर्भवती पत्नी पूनम हैं। भाई हापुड़ गया हुआ है। घर के बाहर कुछ लोग जमा हैं जो किसी अजनबी को देखकर घर के अंदर जाने से रोकते हैं। दरअसल पूनम से यह छुपाया गया है कि रामू अब कभी लौटकर नहीं आएगा। मगर, पूनम का कलेजा अनहोनी की आशंका में कांप रहा है। अन्य घरों में भी हालात ऐसे ही थे। दोपहर में पेड़ की छाया के नीचे अमूमन लोग बैठे दिखते थे, लेकिन रविवार को पूरा गांव शोक में डूबा रहा। अधिकतर घरों के चूल्हे ठंडे पड़े थे।
कुछ पता नहीं चल रहा...कहकर बिलख पड़े परिजन
हादसे का शिकार हुए लोगों के घरों से एक या दो लोग हापुड़ गए हुए हैं। घर में जो रह गए हैं, उनमें से अधिकतर अनहोनी की आशंका से घिरे हुए हैं लेकिन अभी ठीक तरह से नहीं मालूम कि उनके अपनों के साथ क्या हुआ है। वे जीवित भी हैं या नहीं। कुछ पूछने पर इतना ही बोल पाते हैं कि उन्हें कुछ पता नहीं चल रहा है। घर से जो सदस्य हापुड़ गया हुआ है वो भी सच्चाई नहीं बता पा रहा। एक उम्मीद है कि शायद...शायद उनके अपने सलामत हों।
गांव में अधिकतर लोग मजदूरी करते हैं
शाहजहांपुर के सबसे गरीब गांवों में भंडेरी का नाम आता है। लगभग 75 फीसदी आबादी के पास खेती नहीं है। अधिकतर अशिक्षित लोगों के लिए मजदूूरी ही जीवनयापन का साधन है। ये लोग दिल्ली या एनसीआर के इलाकों की फैक्टरी में मजदूरी करते हैं। गांव के कुछ लोग पहले वहां की फैक्टरियों में काम करने गए थे। आठ-दस हजार रुपये में नौकरी के लिए अन्य लोगों ने भी अपने बच्चों को जवान होते ही वहां भेजना शुरू कर दिया। किसी को क्या मालूम था कि एक हादसा उनको जीवनभर सालने वाला जख्म दे जाएगा।