फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

क्रांतिकारियों, कवियों और किसानों पर बोले प्रधानमंत्री

विज्ञापन
कवि दामोदर स्वरूप विद्रोही। संवाद - फोटो : SHAHJAHANPUR
विज्ञापन
शाहजहांपुर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्रांतिकारी, कवि और किसानों पर बात कर शाहजहांपुर की जनता के मन को छुआ। अपने भाषण की शुरुआत में काकोरी कांड के नायक अमर शहीद क्रांतिकारियों पं. रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और ठा. रोशन सिंह को प्रणाम किया। फिर कवि दामोदर स्वरूप विद्रोही, राजबहादुर विकल और अग्निवेश शुक्ला को नमन किया। बाद में किसानों के लिए किए जा रहे सरकार के कामों का बखान किया।
विज्ञापन

शाहजहांपुर को अमर शहीद पं. रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह के कारण शहीद नगरी भी कहा जाता है। आजादी के आंदोलन के इतिहास में शाहजहांपुर का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा हुआ है। स्वतंत्रता आंदोलन के इन योद्धाओं ने शाहजहांपुर को देश-विदेश में पहचान दिलाई। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने अपने भाषण की शुरुआत अमर शहीदों को प्रणाम कर की।
उन्होंने अपने भाषण में शाहजहांपुर के कैंट क्षेत्र में बनकर लगभग तैयार हो चुके शहीद संग्रहालय का जिक्र किया। प्रधानमंत्री ने शहीद संग्रहालय को आजादी के लिए किए गए अद्भुत संघर्ष को देखने के इच्छुक युवाओं के लिए एक शानदार सौगात बताया। फिर उन्होंने शाहजहांपुर के ख्यातिलब्ध त्रि-कवि दामोदर स्वरूप विद्रोही, राजबहादुर विकल और अग्निवेश शुक्ला को नमन किया। इसके बाद उन्होंने भाजपा सरकार द्वारा किसानों के लिए किए जा रहे विकास कार्यों का वर्णन भीड़ के सामने किया।
विज्ञापन

मैं लिख सका न कुछ भी रिसालों के वास्ते,
उत्तर न बन सका हूं सवालों के वास्ते।
जिस दिन सियाह रात छाएगी देश पर,
मेरी तलाश होगी उजालों के वास्ते।।
व्यवस्था को झकझोरने के साथ ही राष्ट्र के लिए अपनी उपादेयता प्रमाणित करने की गरज से ये पंक्तियां रची हैं- अग्निधर्मा कवि दामोदर स्वरूप विद्रोही ने। दो अक्तूबर, 1928 को सिंधौली ब्लॉक के गांव मुड़िया पवार में जन्मे विद्रोही जनपद के प्रथम ऐसे कवि हैं, जिन्हें अखिल भारतीय कवि के रूप में प्रतिष्ठित मंचों पर सम्मान मिला। गुलाम शैशव, दिल्ली की गद्दी सावधान, त्रिधारा, मेरे श्रद्धेय, समय के दस्तावेज, हार हमारी-जीत तुम्हारी, कसक, दीवार के साये में आदि उनकी अन्य प्रसिद्ध कृतियां हैं। 11 मई, 2008 को उनका अवसान हो गया।
------------
धूल के कण रक्त से धोये गये हैं,
विश्व के संताप सब ढोये गये हैं।
पांव के बल मत चलो, अपमान होगा,
सिर शहीदों के यहां बोये गए हैं।।
क्रांतिधरा के शहीदों को समर्पित ये पंक्तियां रचकर यशस्वी कवि राज बहादुर विकल काव्य जगत के ध्रुवतारा बन गए, क्योंकि इन्हीं पंक्तियों ने उन्हेें देश-दुनिया में अलग पहचान दी। दो जुलाई, 1924 को जनपद के रायपुर गांव में जन्मे दादा विकल की अन्य प्रसिद्ध एवं चर्चित कृतियों के माध्यम से भारत के स्वतंत्रता समर में हुंकार भरी। उन्होंने अपने कृतित्व एवं व्यक्तित्व से अतुलनीय शिक्षक, समृद्ध रचनाकार और हिंदी भाषा के प्रबल पक्षधर के रूप मेें अपनी पहचान बनाई। 15 अक्तूबर, 2009 को वह चिरनिद्रा में लीन हो गए।
--------------------
इस धरा से हर अंधेरे को मिटाकर,
सूर्य का पर्याय बनना चाहता हूं।
आदमी के शौर्य के इतिहास का मैं,
श्रेष्ठतम अध्याय बनना चाहता हूं।।
जिजीविषा को सार्थक दिशा देने वाली ये प्रेरणादायी पंक्तियां करीब तीन दशक तक देश के काव्य मंचों पर धूमकेतु की तरह छाए रहे सुविख्यात कवि अग्निवेश शुक्ल ने रची हैं। दो जून, 1953 को भावलखेड़ा गांव में जन्मे इस अग्निधर्मा कवि ने शहीद-ए-वतन अशफाक उल्ला खां की आखिरी रात रचना के माध्यम से सामाजिक सौहार्द का संदेश देश के कोने-कोने तक पहुंचाया। उनका गजल संग्रह रात के पिछले पहर भी काफी लोकप्रिय हुआ। दिल्ली, महाराष्ट्र, राजस्थान आदि राज्यों के शीर्षस्थ मंचों पर सम्मानित हुए। आठ जून, 2003 को उनका देहावसान हो गया।

कवि राजबहादुर विकल। संवाद- फोटो : SHAHJAHANPUR

 

कवि अग्निवेश शुक्ल। संवाद- फोटो : SHAHJAHANPUR

 

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें