नबाव अहमद अली का मकबरा । संवाद
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शाहजहांपुर। ब्रिटिश हुकूमत के जुल्मों से आजादी की लड़ाई में शाहजहांपुर के रणबांकुरों ने तमाम कुर्बानियां दीं। 1857 की क्रांति के योद्धाओं की शहादत का साक्षी चौक कोतवाली क्षेत्र में स्थित नवाब अहमद अली खां का मकबरा भी है। यहां न जाने कितने आजादी के दीवानों को सूली पर चढ़ा दिया गया।
इतिहासकार डॉ. नानक चंद्र मेहरोत्रा ने बताया कि मोहल्ला गौहरपुरा में एबी रिच इंटर कॉलेज के एक ओर मुख्य सड़क पर स्थित इस मकबरे का निर्माण मनसब बेगम पत्नी नवाब अहमद अली खां ने सुनहरी मस्जिद के निर्माण के बाद कराया था। सुनहरी मस्जिद का निर्माण सन 1851-52 में हुआ। इसका अर्थ है कि 1857 की क्रांति के कुछ समय पूर्व ही इसका निर्माण हुआ होगा। अपनी सुंदरता था मजबूती की दृष्टि से यह शाहजहांपुर का एक नामी मकबरा था। क्रांति के बाद मई 1858 में अंग्रेजों ने इस मकबरे को अपने अधिकार में कर लिया। डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट जीपी मनी ने इसी मकबरे को अपना निवास स्थान बनाया। इसी में कचहरी लगती थी।
1857 की क्रांति की विफलता के बाद जो क्रांतिकारी पकड़े गए, उन्हें निकट वकरजई मोहल्ले में लाला रोशनलाल के महल व दीवानखाने में रखा गया। उस समय वह स्थान जेलखाना-सा बन गया था। इसी स्थान पर नीम के पेड़ से लटकाकर न जाने कितने निर्दोष लोगों को फांसी दी गई। 16 जून, 1958 को मौलवी अहमद उल्ला शाह का कटा हुआ सिर इसी स्थान पर लाया गया और यहीं से उसे कोतवाली में बांस पर टांगने का आदेश हुआ। सन 1858 में मनसब बेगम का देहांत शाहबाद में हो गया।
उनके परिवार के लोग उनकी लाश को मकबरे में दफन करना चाहते थे, लेकिन डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने अनुमति नहीं दी। परिणामस्वरूप हकीम अब्दुल कादर खां के मकान के पूर्व में एक पक्के चबूतरे पर उन्हें दफनाया गया। आज यह एतिहासिक मकबरा उपेक्षित है।