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नोमोफोबिया : मानसिक बीमारी बनता जा रहा बेवजह बार-बार मोबाइल देखना

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शाहजहांपुर। अगर आपको बेवजह मोबाइल देखने या थोड़ी देर के लिए भी मोबाइल के दूर होने पर बेचैनी महसूस होती है तो सावधान हो जाइए। ये मानसिक बीमारी के लक्षण हैं। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ ने इसे नोमोफोबिया का नाम दिया है। नोमोफोबिया यानी नो-मोबाइल-फोन-फोबिया।
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राजकीय मेडिकल कॉलेज के क्लीनिकल मनोवैज्ञानिक डॉ. रोहिताश ईशा ने बताया कि यूनाइटेड किंगडम में मोबाइल के प्रयोग को लेकर एक अध्ययन कराया गया था। इसमें पाया गया कि कुल मोबाइल फोन यूजर्स में 53 फीसदी ऐसे पाए गए जिनके पास फोन मौजूद न होने पर उन्हें आंक्जाइटी (बेचैनी, घबराहट) होने लगती है। फोन की बैटरी कम हो जाए या फोन का नेटवर्क चले जाने पर घबराहट होने लगती है या उलझन महसूस होती है। अगर ऐसा हो तो इस बात की काफी संभावना है कि व्यक्ति नोमोफोबिया से ग्रस्त है। उन्होंने बताया कि आज के युग में जहां एक तरफ मोबाइल लोगों के लिए कामकाज और दुनिया से जुड़े रहने में मदद कर रहा है वहीं दूसरी तरफ इसकी लत मानसिक रोगी भी बना रही है। मेसेज या मेल की नोटिफिकेशन टोन बजते ही मोबाइल को देखना भी मानसिक बीमारी का एक लक्षण है।
नोमोफोबिया के लक्ष्ण
आंक्जाइटी या चिड़चिड़ापन, सांस न ले पाना, सिहरन या कंपकंपाहट, गुस्सा आना, मन न लगना, दिल की धड़कन बढ़ जाना, इमोशनल होना, डिप्रेशन, घबराहट होना, डर लगना, किसी पर निर्भर होना, आत्मविश्वास का कम होना, अकेलापन महसूस होना।
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बचाव के उपाय
अपने फोन नोटीफिकेशन को बंद कर दें. सोशल मीडिया एप्लीकेशंस को म्यूट या अनइन्सटॉल कर दें, लिमिटेड इंटरनेट प्लान लें, एक फीचर फोन रखें ताकि इस तरह की चीजों से बचा जा सके, रेग्युलर मेल या मैसेज आएं तो अनसब्सक्राइब कर दें, जब तक यह आदत छूट नहीं जाती तब तक अक्सर फोन स्विच ऑफ रखें।
नोमोफोबिया का शिकार अधिकतर युवा वर्ग हो रहा है। प्रोफेशनल और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए मोबाइल का इस्तेमाल करने के कारण इसकी लत लग जाती है। बिना किसी कारण के युवा घंटों मोबाइल चलाते रहते हैं। इससे उनके कॅरियर पर भी विशेष प्रभाव पड़ता है। घरेलू रिश्तों पर भी फर्क पड़ता है। ध्यान न दिया जाए तो गंभीर परिणाम सामने आते हैं। लोग हत्या एवं आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम भी उठा सकते हैं।- डॉ. रोहिताश ईशा, क्लीनिकल मनोवैज्ञानिक, राजकीय मेडिकल कॉलेज शाहजहांपुर
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