स्वाधीनता संग्राम में सांप्रदायिक एकता की मिसाल पेश करने वाले शाहजहांपुर के क्रांतिकारी दोस्त पं. राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खां के परिवार के नई पीढ़ी वारिस मौजूदा सियासी बयार में उपेक्षित हो रही इस दोस्ती को लेकर मर्माहत है। इनकी बस इतनी - सी ख्वाहिश है कि यह प्रेरणादायक दोस्ती स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल कर ली जाए। वर्ष 1925 मेें नौ अगस्त को काकोरी में जिस सहारनपुर पैसेंजर को रोककर सरकारी खजाना लूटने की ऐतिहासिक घटना में ब्रिटिश हुकूमत ने चार क्रांतिकारियों को फांसी की सजा सुनाई थी, उनमें से शाहजहांपुर के तीन युवाओं में से दांत कटी रोटी वाली दोस्ती को जीने वाले यह दो भी थे।
शाहजहांपुर के टाउन हाल रोड स्थित वर्ष 1877 का निर्मित आर्य समाज मंदिर इनका अड्डा हुआ करता था। वहीं ये जुटते थे। आज भी वह कक्ष यहां अलग सहेजा हुआ है जहां ये दोनों साथी मजहबी भेदों से ऊपर उठकर एक ही थाली में खाना खाते थे और साथ बैठकर क्रांति की योजनाओं को अंतिम रूप देते थे। इसी कक्ष के पास एक यज्ञशाला भी है। मंदिर के पुरोहित पं. राम बहादुर शास्त्री और कोषाध्यक्ष कृष्ण कुमार गुप्ता बड़े ही फख्र से बताते हैं कि दोनों दोस्त इसी यज्ञशाला में साथ - साथ हवन करते थे और वैदिक पद्धति वाली आहुतियां डालते थे। इन्होंने बताया कि तब इस दोस्ती का लोगों ने विरोध भी किया था लेकिन दोनों ही नहीं डिगे। इन्हें भी अफसोस है कि सियासी लोग कौमी एकता के लिए बातें तो बहुत करते हैं लेकिन इस दिशा में मिसाल कायम कर गए क्रांतिकारियों से जुड़ी निशानियां न तो सरकारी स्तर पर सहेजने का जज्बा दिखाया गया एवं ना ही भावी पीढ़ी को उनका यह किस्सा बताने का कोई इंतजाम।
अमर शहीद अशफाक के प्रपौत्र अशफाक उल्ला, अफाक उल्ला और शादाब उल्ला बताते हैं कि अशफाक पं. राम प्रसाद बिस्मिल से उम्र में तनिक छोटे थे क्योंकि उनके बड़े भाई रियासत उल्ला उर्दू मिडिल में बिस्मिल के सहपाठी थे। बड़े भाई से ही पंडित जी के क्रांति वाले कामकाज को सुनकर वह उनसे जुडने को गए तो शुरू में उपेक्षा मिली लेकिन देशप्रेम का जज्बे ने इनका हौसला पस्त नहीं होने दिया। आखिर वे दोनों ऐसे दोस्त बने कि गिरफ्तारी के बाद जेल में सरकारी गवाह बनने के तमाम प्रलोभन और दबाव पर अशफाक बोल उठे थे कि वह अकेले मुस्लिम हैं और देश की खातिर क्रांतिकारियों की इस टोली में फांसी पर चढने वाले भी पहले मुसलमान होंगे इसलिए उनकी जिम्मेवारी ज्यादा बड़ी है। अगर उन्होंने कुछ गड़बड़ की तो पूरी मुसलमान और पठान कौम पर धब्बा लग जाएगा। दबाव बनाने वालों से विनम्रता से गुजारिश की थी कि- Òवतन पर मुझे बाइज्जत मर मिटने दोÓ। यह सुनकर दबाव बनाने वकील और प्रभावशाली लोग निरुत्तर रह गए थे।