केंद्र सरकार एक ओर स्वच्छ भारत अभियान के तहत घर-घर शौचालय बनाने पर जोर दे रही है तो दूसरी ओर मनरेगा के तहत अपने हिस्से का बजट देने में कंजूसी दिखा रही है। शौचालयों के निर्माण में अन्य कई बाधाओं से न केवल लाभार्थी बल्कि संबंधित अधिकारी भी खासे परेशान हैं। इसलिए प्रदेश सरकार का निर्मल भारत अभियान भी रफ्तार पकड़ नहीं पाया है। मौजूदा स्थिति यह है कि जिले के ग्रामीण क्षेत्र में लक्ष्य की तुलना में 58 फीसदी आवास भी नहीं बन पाए हैं।
वर्ष 2012 से शुरू हुए निर्मल भारत अभियान के तहत अब तक जिले को 22006 शौचालय बनाने का लक्ष्य मिल चुका है। बावजूद इसके बीते वर्षों के नौ हजार से अधिक शौचालय नहीं बन पाए। चालू वित्त वर्ष की बात करें तो केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा मद से निर्माण बजट में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने पर भी 12950 लक्ष्य के सापेक्ष अभी सिर्फ 9250 शौचालय बन सके।
हाल ही में प्रदेश स्तर पर हुई समीक्षा से पता चला कि तमाम जिलों में अभी तक लक्ष्य के आधे से भी अधिक शौचालय नहीं बन पाए। इसमें जनपद भी शामिल होने पर अधिकारियों ने निदेशक पंचायत राज के लिए तैयार की गई प्रगति रिपोर्ट में शौचालय निर्माण की बाधाओं को प्रमुखता दी है। रिपोर्ट में लाभार्थियों की ऑनलाइन इंट्री में देरी को भी शौचालय निर्माण में पिछड़ने का अहम् कारण बताया है।
शौचालय निर्माण में बाधाएं
0 मनरेगा के तहत शौचालय निर्माण में केंद्र सरकार के हिस्से का समय से बजट नहीं मिलना।
0 नदियों से खनन पर रोक लगी होने से रेता और मिट्टी की उपलब्धता में कमी।
0 लाभार्थियों की ऑनलाइन फीडिंग मेें देरी से स्वीकृत बजट राशि जारी करने में व्यवधान पड़ा।
0 मनरेगा में मजदूरी के नए मानक तय होने से मिस्त्री-मजदूरों द्वारा दिहाड़ी दरों में बढ़ोत्तरी।
0 लाभार्थियों द्वारा अपने हिस्से की रकम खर्च नहीं करना।
बरेली मंडल में जिले का पहला नंबर
‘कई कारणों से जिले में लक्ष्य की तुलना में लगभग 42 फीसदी शौचालय बन पाए हैं। बावजूद इसके प्रगति के मामले में अपना जिला बरेली मंडल मेें पहले स्थान पर है। निदेशक को शौचालय निर्माण में पिछड़ने के कारणों सहित रिपोर्ट देकर उनसे शौचालय के निर्माण बजट में बढ़ोत्तरी और नदियों तटवर्ती गांवों में मार्डनाइज्ड टायलेट बनाने के संबंध में दिशा-निर्देश लेंगे।’
-चंद्रिका प्रसाद, डीपीआरओ