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नई प्रजातिः गन्ने को लाल सड़न से बचाएगी और उत्पादन बढ़ाएगी

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शाहजहांपुर में गन्ना शोध परिषद का मुख्य भवन। संवाद - फोटो : SHAHJAHANPUR
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शाहजहांपुर। गन्ना शोध परिषद के वैज्ञानिकों ने गन्ने की ऐसी प्रजाति तैयार की है जिसमें लागत कम आएगी और उत्पादन बढ़ जाएगा। इसकी औसत उपज 81 से 92 टन प्रति हेक्टेयर होती है। दो वर्ष पहले को-0238 प्रजाति में गन्ना का कैंसर कही जाने वाली रेड रॉट (लाल सड़न) बीमारी का प्रकोप देखे जाने के बाद यहां के वैज्ञानिकों ने विकल्प के तौर पर कोशा .13235 प्रजाति खोजी है। किसानों ने इसके बीज की बुआई भी शुरू कर दी है।
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वैज्ञानिकों के अनुसार ये प्रजाति शीघ्र पकने वाली है और सामान्य कीट रोग की व्याधियों से मुक्त होने के साथ ही औसत उत्पादन भी बढ़ाएगी। इसके अतिरिक्त अन्य कई प्रजातियां भी किसानों में प्रोत्साहित की जा रही हैं। परिषद के प्रसार अधिकारी संजीव पाठक ने बताया कि इन केेंद्रों पर न केवल नई प्रजातियों पर शोध कार्य हो रहा है, उनके बीज से परीक्षण के तौर पर फसलें उगाई जा रही हैं।
इन्हीं फसलों से प्रति हेक्टेयर उत्पादकता का आकलन किया जाता है। गुड़ और शक्कर तैयार कर खोजी गई प्रजाति में शर्करा प्रतिशत का अनुमान भी लगाया जाता है। बाद में शीघ्र पकने वाली और अधिक औसत उत्पादकता के साथ ज्यादा मिठास देने वाली प्रजातियों का बीज तैयार कर प्रदेश की चीनी मिलों के माध्यम से किसानों में उनका वितरण कराया जा रहा है।
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वर्ष 1912 में गठित गन्ना शोध परिषद ने अब एक संस्थान के तौर पर पूरे प्रदेश में विस्तार कर लिया है और विभिन्न जनपदों में उसके नौ शोध केंद्र संचालित हो रहे हैं। परिषद की एक सदी से अधिक के लंबे कालखंड की विकास यात्रा के दौरान कृषि वैज्ञानिकों ने अभी तक 150 से अधिक गन्ना प्रजातियां खोजी हैं। समय के साथ गन्ना में लगने वाली बीमारियों के आधार पर संबंधित प्रजातियों का संवर्धन कर उन्हें रोग प्रतिरोधी बनाया जा रहा है। साथ ही बुआई की उन्नत तकनीक भी विकसित हो रही है। गन्ना बुआई की हाल में खोजी गई ट्रेंच विधि पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी उप्र के किसानों में लोकप्रिय हुई है।
दो वर्ष पहले तक अधिक उत्पादन एवं ज्यादा चीनी परता देने वाली को.0238 गन्ना प्रजाति जिले के किसानों में काफी लोकप्रिय रही। बेहतर चीनी उत्पादन के लिए चीनी मिलें भी इस प्रजाति की बुआई के लिए किसानों को प्रोत्साहित करती रही हैं, लेकिन इसी प्रजाति पर लाल सड़न का ज्यादा प्रकोप देखे जाने पर गन्ना आयुक्त ने एडवाइजरी जारी कर किसानों को उसके स्थान पर परिषद के सहयोग से खोजी गईं को.0118, को.से.0118, को.से.8282 और को.लख.94184 प्रजातियों का बुवाई में प्रयोग करें। इसी कड़ी में अब नई प्रजाति कोशा.13235 का उदय हुआ है।
कोशा.13235 का एक करोड़ सिंगल बड बीज आवंटित
परिषद मुख्यालय से शरदकालीन गन्ना बुवाई के लिए नई प्रजाति कोशा.13235 का सिंगल बड चिप विधि से तैयार एक करोड़ बीज किसानों को वितरित करने के लिए विभिन्न जनपदों को भेजा है। परिषद के वैज्ञानिकों के अनुसार यह बीज जनपद समेत सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली, बुलंदशहर, बागपत, गाजियाबाद, मेरठ, बिजनौर, मुरादाबाद, अमरोहा, रामपुर, बरेली, बदायूं, कासगंज, पीलीभीत, सीतापुर, लखीमपुर हरदोई, फर्रुखाबाद, अयोध्या, बाराबंकी, सुल्तानपुर, बलरामपुर, बहराइच, गोंडा, बस्ती, गोरखपुर आदि अन्य गन्ना उत्पादक जनपदों के किसानों को सुलभ कराया जा रहा है। यह किस्म हाल में ही स्वीकृत हुई है इसलिए वैज्ञानिक टिशूकल्चर, एसटीपी आदि विभिन्न माध्यमों से इसका तेजी से विकास करने में जुटे हैं।
नई प्रजाति में तमाम विशेषताएं समाहित
परिषद के वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी (प्रजनन) डॉ.. विनय श्रीवास्तव का कहना है कि कोशा.13235 प्रजाति उपज के साथ चीनी परता में बेहतर है। इस प्रजाति में कीट-रोगों का प्रकोप भी न्यून है और इसकी पेड़ी क्षमता अच्छी है। यह गन्ना मजबूत होने के कारण तेज हवा में जल्दी गिरता नहीं है। उन्होंने बताया कि जिन क्षेत्रों और खेतों में लाल सड़न रोग का भीषण प्रकोप है, उनसे संबंधित किसानों को कोशा. 13235 अथवा अन्य किस्मों की बुवाई कम से कम एक वर्ष न करने की सलाह दी जा रही है जिससे कि उन खेतों की मृदा पूरी तरह इस रोग से मुक्त हो सके और नई प्रजाति लाल सड़न की चपेट में नहीं आ सके।
नई प्रजाति से प्रति हेक्टेयर दस टन ज्यादा मिलेगी उपज
परिषद के प्रसार अधिकारी संजीव पाठक ने बताया कि रेड रॉट बीमारी के कारण प्रतिबंधित की गई गन्ना प्रजाति को-0238 प्रजाति से प्रति हेक्टेयर 75 से 81 टन गन्ना उपज होती थी, लेकिन उसके विकल्प के तौर पर इस्तेमाल हो रही कोशा. 13235 प्रजाति से आठ से दस टन प्रति हेक्टेयर उपज ज्यादा मिल रही है। उन्होंने बताया कि को-0238 प्रजाति की बुआई में फफूंदनाशक कोराजिन रसायन लगाना अनिवार्य होता था। इस पर प्रति हेक्टेयर लगभग 4500 रुपये खर्च होते थे, लेकिन नई प्रजाति मध्यम रोग प्रतिरोधी होने के कारण कृषि रक्षा रसायनों पर होने वाला व्यय बचेगा।
गन्ने की एक किस्म का विकास वैज्ञानिकों के गहन शोध के बाद लगभग दस वर्ष में होता है। कोशा.13235 अगेती किस्म है जो एमएस.6847 और को.1148 प्रजातियां संयोग से विकसित की गई हैं। इसका गन्ना सीधा, मोटा, मध्यम कड़ा तथा पीला हरा सफेदी लिए हुए ठोस होता है। इसकी औसत उपज 81 से 92 टन प्रति हेक्टेयर है और व्यावसायिक दृष्टि से शर्करा उपज 11.55 प्रतिशत पाई गई है। विशेष बात यह है कि लाल सड़न रोग के प्रति यह प्रजाति मध्यम रोग रोधी है।
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-डॉ. ज्योत्स्नेंद्र सिंह, निदेशक, गन्ना शोध परिषद
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