मेंहदावल। शिक्षक कक्षा में ऐसा जीवंत और समावेशी वातावरण बनाएं, जिससे बच्चों में सीखने की रुचि बढ़े और वे विद्यालय आने के लिए प्रेरित हों। इसके लिए प्रिंट-रिच सामग्री, टीएलएम संदर्शिका, कार्य पुस्तिका व किट्स जैसी उपलब्ध शिक्षण सामग्री का प्रभावी उपयोग किया जाए।
बृहस्पतिवार को बीईओ आशीष कुमार सिंह ने यह बातें शिक्षण गुणवत्ता संवर्द्धन विषय पर शिक्षकों को निर्देशित करते हुए कहीं। उन्होंने बताया कि बच्चों के अनुभवों की गुणवत्ता, उन्हें सीखने, उपलब्धि हासिल करने और विद्यालय समुदाय में पूरी तरह भाग लेने में सहायता प्रदान करना है। समावेशी शिक्षा का अर्थ है व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पहचान करना, उनका आंकलन करना और उन्हें पूरा करना तथा यह सुनिश्चित करना कि सभी बच्चे अपनी पूरी क्षमता का विकास छात्रों को दिन की शुरुआत में स्पष्ट दिनचर्या से लाभ होता है ताकि वे प्रभावी ढंग से व्यवस्थित हो सकें।
दृश्य संकेत बच्चों को इस नियमित अभ्यास की याद दिला सकते हैं। कुछ बच्चों को हर सुबह कक्षा में आने पर कुछ विशेष भूमिकाएं निभानी पड़ सकती हैं, जैसे अध्ययन सामग्री बांटना। शिक्षकों को अपनी कक्षा को न केवल एक शिक्षण कक्ष नहीं, बल्कि सीखने और आनंद का केंद्र बनाना है। जहां बच्चे खेल-खेल में सीखें व निपुणता के लक्ष्य को सफलतापूर्वक प्राप्त करने के लिए अग्रसर रहें।
निपुणता के लिए स्कूलों में कक्षा-एक से तीन तक के बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रिंट रिच वातावरण तैयार करें। दीवारों पर रंगीन चार्ट, शब्द कार्ड, चित्र पुस्तकें और कविता पोस्टर बच्चों की पठन-पाठन के प्रति रुचि बढ़ाएं।
भाषा के प्रति भी उनमें आत्मीय जुड़ाव पैदा करें। बच्चों को हर तरफ शब्द और चित्र दिखने लगे, जिससे उनका ध्यान स्वयं पठन की ओर जाए। इसके अलावा शिक्षक बिग बुक का सृजनात्मक उपयोग करते हुए सामूहिक पाठन रोचक बनाएं। बड़े आकार की पुस्तक, सुंदर चित्र और स्पष्ट अक्षरों वाली कहानियां बच्चों को दृश्यात्मक और श्रव्य रूप से जोड़ती हैं।
इससे उनका शब्द ज्ञान बढ़ेगा। बच्चों की पढ़ने की गति और क्षमता अलग-अलग होगी। इसको ध्यान में रखकर शिक्षक अलग-अलग स्तर की पाठ्य सामग्री का प्रयोग कर हर बच्चे को अपनी गति से सीखने में समर्थ बनाने का प्रयास करना चाहिए।