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एक रुपये की पर्ची, दो हजार का इलाज

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एक रुपये की पर्ची, दो हजार का इलाज
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सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैंसर बाजार में मरीजों को खरीदनी पड़ती है बाहर से महंगी दवाई
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मरीज औसतन प्रतिदिन आते हैं इलाज के लिए मलौली सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में
खगेंद्र प्रसाद मिश्रा
धनघटा। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मलौली में इलाज के लिए मरीज को एक रुपये की पर्ची बनवानी पड़ती है, लेकिन अधिकतर दवाइयां बाजार से महंगी दर पर खरीदनी पड़ती हैं। मुफ्त इलाज के चक्कर में इलाज के लिए सरकारी अस्पताल आने वाले मरीज, ठगे रह जाते हैं। कइयों की हालत ऐसी होती है कि अस्पताल में जो दवाई मिली, वही लेकर घर चले जाते हैं, क्योंकि उनकी जेब में बाजार की महंगी दवाई खरीदने के लिए पैसे नहीं होते हैं। ऐसा एक दिन नहीं, हर रोज कइयों के साथ होता है।
जानकारी के अनुसार, हैंसर बाजार के पास स्थित मलौली सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रतिदिन औसतन चार से पांच सौ मरीज इलाज के लिए आते हैं। लाइन लगाने के बाद उनका एक रुपये में पंजीकरण होता है और डॉक्टर को दिखाने के लिए पर्ची मिलती है। पर्ची लेकर मरीज जब चिकित्सक के पास पहुंचते हैं, तो कुछ ही मिनटों में दवा लिख दी जाती है। अगर डॉक्टर के समझ में रोग नहीं आया तो जांच कराने के लिए भी कह दिया जाता है, जिसमें से अधिकतर जांचें अस्पताल में नहीं होती हैं। इसी तरह पर्ची पर लिखी गईं अधिकतर दवाएं अस्पताल में नहीं मिलती हैं। शेष दवाइयां अस्पताल के बाहर मेडिकल स्टोर से खरीदनी पड़ती हैं, जिसे अधिकतर मरीज खरीद नहीं पाते हैं। पैसे नहीं होने के कारण कई लोग कम दवाएं खरीदते हैं, तो कई बिना दवा लिए ही चले जाते हैं। जो पूरी दवाई खरीदते हैं, उन्हें हजार से दो हजार रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं। यदि किसी को निजी लैब से जांच भी करानी पड़ गई तो उसका बजट दो से चार हजार तक पहुंच जाता है। संवाद
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ऐसे समझें आम आदमी का हाल
केस एक-
सोमवार को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मलौली पर किसान अंबिका पेट दर्द का इलाज कराने आए थे। उनका गांव गायघाट करीब 20 किलोमीटर दूर है। अस्पताल में डॉक्टर को दिखाने के बाद दवा काउंटर पर पहुंचे तो पेट दर्द की दो दवा देने के बाद शेष दवाओं के लिए मेडिकल स्टोर का रास्ता दिखा दिया गया। उन्हें बाहर के मेडिकल स्टोर से 748 रुपये की दवाई खरीदनी पड़ी।
केस दो
करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित रामपुर गांव से इलाज कराने आए किसान बैजनाथ ने बताया कि 100 रुपये किराया खर्च कर अस्पताल पहुंचे हैं। पेट में सूजन है। डॉक्टर ने जो दवाई लिखी, उसमें से एक दवा अस्पताल से मिली। बाकी की दवाई 988 रुपये की मेडिकल स्टोर से खरीदनी पड़ी। बैजनाथ के पेट का अल्ट्रासाउंड कराने के लिए भी डॉक्टर ने लिखा। अल्ट्रासाउंड अस्पताल में नहीं होने से बाहर से कराना पड़ा, जिसकी कीमत 800 रुपये चुकानी पड़ी। इस तरह उन्हें एक बार में ही 1888 रुपये खर्च करने पड़ गए। उन्होंने कहा भी कि मुफ्त इलाज के चक्कर में आए थे। दो हजार खर्च करके जा रहे हैं।
केस तीन
करीब आठ किलोमीटर की दूरी तय करके प्रजापतिपुर गांव से आए रामभरोस के पेट में गैस बनने की शिकायत थी। यह सोचकर सरकारी अस्पताल आए थे कि मुफ्त में इलाज हो जाएगा। पहले तो करीब आधा घंटा लाइन में लगने के बाद पर्ची बनी। इसके लिए एक रुपये देने पड़े। इसके बाद डॉक्टर को दिखाने के लिए लाइन लगानी पड़ी। डॉक्टर ने देखा तो दवाएं पर्ची पर लिख दीं। इनमें से एक भी दवा अस्पताल से नहीं मिलीं। 635 रुपये की दवाई अस्पताल के बाहर स्थित मेडिकल स्टोर से खरीदनी पड़ी। रामभरोस मजदूरी करके गुजारा करते हैं।
केस चार
पांच किलोमीटर दूर स्थित निरंजनपुर गांव से आए किसान शंभू ने बताया कि वे एक माह से बुखार से पीड़ित हैं। अस्पताल आने के आधा घंटे बाद एक रुपये की पर्ची बन सकी। डॉक्टर ने खून की जांच कराने के लिए लिखा, तो बाहर से जांच करानी पड़ी। इसके बाद रिपोर्ट लेकर डॉक्टर साहब के पास गए तो उन्होंने दवाई लिखी, जिसमें से तीन दवाएं अस्पताल से मिलीं, 415 रुपये की दो दवाएं बाहर से खरीदनी पड़ीं।
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निजी लैब में जांच का खर्च
- थाइराइड - 850 रुपये
- एक्सरे चेस्ट- 300 रुपये
- एक्सरे कमर- 450 रुपये
- शुगर जांच- 60 रुपये
- अल्ट्रासाउंड- 700 से 800 रुपये
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अस्पताल में दवाएं पर्याप्त मात्रा में हैं। अगर डॉक्टर बाहर की दवा लिखते हैं, तो गलत है। इसके लिए सभी सीएचसी और पीएचसी को निर्देश दिया गया है कि दवाएं अस्पताल से ही दी जाएं। अगर बाहर की दवा लिखते कोई चिकित्सक पाया जाएगा, तो कार्रवाई की जाएगी।
- डॉ. इंद्रविजय विश्वकर्मा, सीएमओ
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