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मेहमान पक्षियों से गुलजार हुआ बखिरा

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बखिरा पक्षी विहार का दृश्य। - फोटो : KHALILABAD
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मेहमान पक्षियों से गुलजार हुई बखिरा झील
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दीपावली से होली तक रहता है प्रवासी पक्षियों का बसेरा
सुविधाओं की कमी से सीमित संख्या में आते हैं पर्यटक
संतकबीरनगर। ठंड शुरू होते ही बखिरा झील में मेहमान पक्षी आने लगे हैं। इस बार करीब 12000 पक्षियां पहुंच चुकी हैं। कोहरा पड़ने पर इनकी संख्या और बढ़ेगी। विभिन्न प्रजाति की रंग बिरंगी देसी विदेशी पक्षियों से दिवाली से होली तक गुलजार रहने वाली बखिरा झील बेहतर पर्यटन स्थल साबित हो सकती है। जरूरत इस दिशा में समुचित कदम उठाने की है। यदि झील को पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित कर दिया जाए तो क्षेत्र का भी विकास होगा और सैकड़ों लोगों को रोजगार के अवसर भी मिलेेंगे।
जनपद मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में खलीलाबाद-मेंहदावल मार्ग पर स्थित बखिरा कस्बे से तीन किलोमीटर पूर्वी दिशा में बखिरा पक्षी विहार है। कभी बखिरा झील को मोती झील कहा जाता था। इसके किनारे गांवों में रहने वाले मछुवारा समुदाय की आजीविका झील पर आश्रित है। वर्ष 1990 में केंद्र सरकार ने इस झील को पक्षी विहार का दर्जा दिया, लेकिन तीन दशक बाद भी इसका विकास नहीं हो सका है। बखिरा पक्षी विहार 29 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला है। जलाशय को देखकर समुद्र का एहसास होता है। झील के बीच-बीच में नरकट की मौजूदगी इसे रहस्यमय बना देती है। ठंड के दिनों में सैलानी इसकी छंटा देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। नवंबर से जनवरी तक हजारों किलोमीटर की दूरी से आने वाले पक्षियों की चहचहाहट समूची फिजा में मधुर संगीत घोल देती है।
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113 प्रजाति की आती हैं पक्षियां
बखिरा झील में वर्ष भर पानी रहता है। इसके चलते जलीय वनस्पतियां, छोटे-छोटे कीड़े, घोंघे व सीप आदि इसमें पलते हैं। यूरोप, साइबेरिया, तिब्बत (चीन) से पक्षियां आती हैं। सर्दी का मौसम गुजरने के बाद प्रवासी पक्षी लौट जाते हैं। वन विभाग के अनुसार झील में हर साल तकरीबन 113 प्रजाति के प्रवासी पक्षी आते हैं। इनमें अधिकतर शाकाहारी होते हैं। ये पक्षी भोर से झील के किनारे उगे झाड़-झुरमुटों में भोजन तलाशते हैं। झील में आने वाले प्रवासी पक्षियों में लालसर, हिवीसिल, पोचार्ड, सूरखाब, गोजू, सवल, पिंटेल, मूरहेन आदि प्रमुख हैं।
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स्थानीय पक्षियों का भी रहता है डेरा
बखिरा झील में प्रवासी ही नहीं स्थानीय पक्षियों का डेरा रहता है। इनमें कैमा, वाटरहेन, राईटर, कारमोरेंट, विभिन्न प्रजाति के बगुले, सारस आदि शामिल हैं। गांव के प्रधान शिव प्रसाद तिवारी, रामनिधि तिवारी, रवींद्र नाथ तिवारी, उमाशंकर, कमला प्रसाद, अनिल कुमार, कौशल किशोर, राहुल, प्रेम कुमार ने बताया कि पहले इस झील का नाम मोती था। इसे इतिहास में मोती झील के नाम से जाना जाता है। सरकार ने इसकी महत्ता को देखते हुए पक्षी विहार घोषित कर दिया। तभी से चिड़ियों व मछली मारने पर प्रतिबंध लगा है। हालांकि शासन ने झील को पक्षी विहार घोषित कर रखा है, लेकिन इसके विकास के लिए खास कुछ नहीं किया गया है।
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दस करोड़ का भेजा गया है प्रस्ताव : बघेल
मेंहदावल के विधायक राकेश सिंह बघेल ने बताया कि बखिरा झील को पर्यटक स्थल के रूप में विकसित कराने की मंशा है। इसके विकास के लिए दस करोड़ रुपये का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। सैलानियों की सुविधा के लिए सड़क, पार्किंग, प्लेटफार्म, कैंटीन आदि की सुविधाएं मुहैया कराने का प्रयास है। नाव और नाविक की बेहतर सुविधा रहेगी। उम्मीद है जल्द प्रस्ताव को शासन से स्वीकृति मिल जाएगी।
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बीते वर्षों में झील में 40 से 45 हजार प्रवासी पक्षी आए हैं। पोछांस, पटेहरा और टिकिया प्रजाति की पक्षियां अधिक आती हैं। पहले झील महराजगंज जिले के सोहगीबरवां रेंज से जुड़ी थी, लेकिन जून 2020 में संतकबीरनगर वन प्रभाग से जुड़ गई। यहां दो फारेस्टर, चार फारेस्टर गार्ड और चार नाविक के पद सृजित हैं, लेकिन दो फारेस्टर गार्ड और एक नाविक उपलब्ध है। चार नाविक दैनिक मजदूरी पर रखे गए हैं। 2879 हेक्टेयर झील की जमीन है। जबकि 1059 हेक्टेयर स्थानीय किसानों की जमीन है। यदि सरकार किसानों की जमीन का मुआवजा दे तो समस्या का समाधान हो जाएगा।
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- रणविजय सिंह, रेंजर बखिरा
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बखिरा झील के विकास के लिए वन विभाग ने दो करोड़ रुपये का प्रस्ताव तैयार कर केंद्र सरकार को भेजा है। इसमें प्रवासी पक्षियों की सुविधा प्रदान करने के साथ झील के किनारे सीढ़ियां बनवाने का प्रस्ताव शामिल है। पर्यटकों की सुविधाओं के लिए विकास कार्य कराए जाएंगे।
- रंगाराजू टी, डीएफओ संतकबीरनगर
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