संभल। कोरोना संक्रमण की पहली लहर के दौरान लॉकडॉउन के दौरान दूसरे प्रदेशों व शहरों से गांव और कस्बे लौटे लोगों ने रोजगार के अवसर अब गांव और शहर में ही तलाश लिए। भूखे प्यासे कई दिनों के पैदल सफर के बाद घर पहुंचने पर उनका हौसला ऐसा टूटा कि वह फिर बड़े शहर नहीं लौटे।
उन्होंने अपने रोजगार की व्यवस्था गांव और शहर में ही कर ली है। अभी भी बड़े शहरों का रुख करने की हिम्मत नहीं दिखा रहे हैं। रोजगार इतना ही मिल रहा है जितना परिवार का गुजारा हो जाए लेकिन इसमें भी संतुष्ट हैं। मनरेगा मजदूरी भी ऐसे लोग कर रहे हैं।
ऐसे तमाम उदाहरण संभल जिले में हैं। जिन्होंने लॉकडाउन के दौरान मुश्किल हालात का सामना करा और अब खुद को संभाल लिया है।
घर लौटने पर खुद को संभालने की कहानी प्रवासियों की जुबानी
गुन्नौर तहसील के गांव सिरसा निवासी ऋषिपाल सिंह बताते हैं कि वह चंडीगढ़ में मजदूरी करते थे। कोरोना संक्रमण की पहली लहर के दौरान लॉकडाउन लगा तो 10 दिन तक पैदल सफर किया। किसी तरह गांव पहुंचे और उसके बाद से फिर किसी दूसरे शहर मजदूरी के लिए नहीं गए। इस समय गांव में रहकर ही मजदूरी करते हैं और परिवार की गुजर हो रही है। बाहर जाने से अब इनकार करते हैं।
गुन्नौर तहसील के गांव सिरसा निवासी अमर सिंह बताते हैं कि वह दिल्ली के पहाड़गंज इलाके में एक सिलाई फैक्टरी में कारीगरी करते थे। लॉकडाउन के दौरान मुश्किल से घर तक पहुंचे। इसके बाद फिर वह दिल्ली नहीं लौटे। खुद की सिलाई की दुकान अब कर ली है और पूरे परिवार की जिम्मेदारी आसानी से उठा पा रहे हैं। अब दिल्ली जाने का कोई इरादा नहीं है।
संभल तहसील के गांव राया बुजुर्ग निवासी असगर बताते हैं कि वह हिमाचल प्रदेश में मजदूरी करते थे। लॉकडाउन के दौरान भूखे प्यासे रहकर गांव तक पहुंचे। इसके बाद गांव में मजदूरी शुरू कर दी। अब मनरेगा में मजदूरी भी मिल जाती है। परिवार की गुजर सही हो रही है। दूसरे शहर जाने की हिम्मत नहीं हो रही है।
संभल तहसील के गांव बाबूखेड़ा निवासी गुड्डू खां ने बताया कि वह और उनका बेटा केरल में रहकर हेयर सैलून पर काम करते थे। लॉकडाउन लगा तो नौकरी छूट गई। गांव लौट आए और अब गांव में ही दुकान चला रहे हैं। परदेस के बराबर कमाई तो नहीं है लेकिन परिवार के साथ रहते हैं। अब परदेस जाने का कोई इरादा नहीं है।