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छड़ियों का हुआ शृंगार, बाबा की शान में होंगे बसेरे

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मोहल्ला गणपत सराय में अपने स्थान पर विराजमान नेजा जी और सरदार छड़ी। - फोटो : SAHARANPUR
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सहारनपुर। मेला गुघाल को लेकर तैयारियां शुरू हो गई हैं। जाहरवीर गोगा महाराज के प्रतीक चिह्न नेजा और सभी 26 छड़ियों का श्रद्धाभाव से शृंगार किया गया। भक्तों ने मंत्रोच्चारण के साथ निशानियों के हाथों में डोरी बांधकर संकल्प दिलाया।
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शुक्ल पक्ष की दशमी इस बार 16 सितंबर को पड़ रही है। इस दिन गंगोह रोड स्थित बाबा श्री जाहरवीर गोगा महाराज की म्हाड़ी पर तीन दिवसीय मेला लगता है, जिसमें ढाई से तीन लाख श्रद्धालु निशान व प्रसाद चढ़ाने पहुंचते हैं। इस दिन सभी छड़ियां मेला गुघाल परिसर स्थित श्री विश्रामपुरी काल भैरव मंदिर में एकत्र होती हैं और यहां से गंगोह रोड स्थित म्हाड़ी के लिए नेजे की अगुवाई में प्रस्थान कर जाती हैं। तीसरे दिन छड़ियां वापस लौटती हैं, साथ ही नगर में छड़ियों का भ्रमण होता है, यह परंपरागत कार्यक्रम तीन दिन चलता है।
इसी की तैयारी को लेकर बृहस्पतिवार को मोहल्ला गणपत सराय में भगत विनोद प्रकाश ने नेजे और सरदार छड़ी का पूजन किया। इसी तरह पुरानी चुंगी के निकट भगत पंकज उपाध्याय और मोहल्ला रागनगर पठानपुरा में चौधरन छड़ी के भगत गुलशन सागर ने मंत्रोच्चारण के साथ पूजा अर्चना कराकर निशानियों को डोरी बांधी है। इसी तरह सभी भक्तों ने अपनी-अपनी छड़ियों का शृंगार किया।
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घर-घर पूजी जाएंगी छड़ियां, होंगे बसेरे
शृंगार के साथ छड़ियों का भ्रमण भी शुरू हो गया है। छड़ियों को भक्त और निशानिए घर-घर लेकर जाएंगे, जहां पर लोग पूजन कर बाबा का आशीर्वाद लेंगे। रात में श्रद्धालुओं के घर बसेरों का आयोजन किया जाएगा, जिसमें यजमान के घर बैंडबाजों के साथ छड़ी पहुंचेगी। महानगर में 300 से अधिक बसेरों का आयोजन पूर्व के वर्षों में होता आया है। बसेरों में रात्रि में बाबा श्री जाहरवीर गोगा महाराज की कथा और उनकी वीरता के किस्से सुनाए जाते हैं।
कोरोना की वजह से नहीं हुआ था मेला
बीते वर्ष कोरोना संक्रमण को देखते हुए गंगोह रोड स्थित म्हाड़ी पर मेले को प्रशासन ने अनुमति नहीं दी थी। 800 साल के इतिहास में पहली बार मेला आयोजित नहीं हुआ था, लेकिन इस बार भक्तों ने 16 सितंबर से मेले की तैयारियां शुरू कर दी हैं।
कबली भगत को दिया था नेजा
छड़ियों के भक्त बताते हैं कि बाबा श्री जाहरवीर गोगा महाराज अक्सर गंगा स्नान के लिए हरिद्वार जाते थे। यात्रा के दौरान वह गंगोह मार्ग पर रुकते थे। जाहरवीर महाराज ने सैकड़ों वर्ष पूर्व कबली भगत को गंगोह मार्ग पर तालाब से मछलियां पकड़े देखा था। तब कबली भगत से कहा था कि मछली पकड़ने का काम छोड़कर म्हाड़ी बनवाकर पूजा करें। कबली भगत को चांदी का नेजा दिया था। तब यहां म्हाड़ी का निर्माण हुआ और बाबा जाहरवीर की शान में मेला लगता आ रहा है।
राजस्थान के ददरेगा में जन्मे थे जाहरवीर
जाहरवीर गोगा महाराज का जन्म राजस्थान के चुरू जिले के गांव ददरेगा में हुआ था। चुरू जिले का नाम बाद में राजगढ़ हो गया। इनके पिता जेवर सिंह और माता का नाम बाछल था। ये राजा उमर सिंह के वंशज थे। जो अत्यंत बलशाली वीर थे। भक्त बताते हैं कि जाहरवीर गोगा के जन्म से पूर्व उनके पिता जेवर सिंह काफी सोच में रहते थे। बाबा गुरू गोरखनाथ ने जेवर सिंह को आशीर्वाद देकर कहा कि तुम्हारे घर ऐसा पुत्र जन्म लेगा, जो धर्म की रक्षा करेगा।

पुरानी चुंगी पर छड़डी पूजन करते भक्त- फोटो : SAHARANPUR

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