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युवाओं में मशरूम की खेती का क्रेज बढ़ा

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किसान अग्रेंज - फोटो : SAHARANPUR
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सहारनपुर। कम लागत अधिक मुनाफा। जहां किसान अपनी फसलों की लागत को तरस रहा है, वहीं जनपद के युवाओं का मशरूम की खेती ने ‘‘क्रेजी’’ कर दिया है। एक-दो दर्जन नहीं प्रतिवर्ष करीब 150 युवा मशरूम की खेती का प्रशिक्षण ले रहे हैं। हैरान करने वाली बात ये है कि इस समय जनपद के साठ गांवों में दो सौ से अधिक युवा इसकी खेती को करके बड़ा मुनाफा कमा रहे हैं। जनपद में मशरूम का प्रतिवर्ष उत्पादन करीब 400 टन तक पहुंच गया है। दिलचस्प बात ये है कि यहां से दिल्ली, चंडीगढ़, हरिद्वार, देहरादून आदि शहरों तक सहारनपुर का मशरूम पहुंच रहा है।
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परंपरागत खेती में घटते मुनाफे को देख युवा किसानों का रुझान कृषि विधिकरण की ओर हो रहा है। ग्रामीण युवा किसान मशरूम की खेती को तेजी से अपना रहे हैं। जनपद में वर्ष भर मशरूम की खेती सफलतापूर्वक होती है। इसमें सफेद बटन मशरूम, ढिंगरी मशरूम और मिल्की मशरूम शामिल हैं। इसमें सफेद बटन मशरूम की खेती अक्तूबर माह से फरवरी-मार्च तक, ढिंगरी मशरूम की खेती मार्च से मई तक और मिल्की मशरूम की खेती जून से सितंबर महीने तक होती है। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी और मशरूम विशेषज्ञ डॉ. आईके कुशवाहा ने बताया कि जिले में 60 गांवों में करीब 200 मशरूम की इकाइयां स्थापित हैं। जनपद में प्रतिवर्ष लगभग 400 टन मशरूम का उत्पादन होता है।
कृषि विज्ञान केंद्र देता है प्रशिक्षण
कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी डॉ. आईके कुशवाहा ने बताया केवीके में 150 युवा प्रतिवर्ष मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण लेते हैैं। उनको मशरूम की खेती की तकनीक, लगने वाली बीमारियों से लेकर उसकी बिक्री और उसमें वैल्यू एडिशन आदि जानकारी दी जाती है।
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ग्राम मल्हीपुर में मशरूम की खेती कर रहे युवा किसान अनुराग ने बताया कि उन्होंने केवीके के साथ ही हिमाचल प्रदेश के सोलन से भी मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण लिया। उन्होंने 2600 वर्ग फुट में मशरूम उत्पादन इकाई स्थापित कर रखी है। ताजी मशरूम को बाजार में सप्लाई करने के साथ ही उसको प्रोसेस कर मुरब्बा, बिस्कुट, अचार और पाउडर भी बनाया जाता है।
ग्राम खटका हेड़ी के मशरूम उत्पादन किसान अंग्रेज ने बताया कि वे करीब एक हजार बैग में मशरूम की खेती कर रहे हैं। इस समय उन्होंने सफेद बटन मशरूम लगा रखी है। जिसे 80 से 100 रुपये प्रति किलो की दर से बेच रहे हैं। इसकी सप्लाई देहरादून, हरिद्वार में की जा रही है। स्थानीय स्तर पर इसकी खपत अधिक नहीं है। कम लागत और अच्छे उत्पादन के चलते मशरूम की खेती फायदेमंद है।

किसान अनुराग- फोटो : SAHARANPUR

मशरूम की खेती- फोटो : SAHARANPUR

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