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होली पर परंपरा : इस गांव में होली पर नहीं होता हुड़दंग, भजनों पर झूमते हैं ग्रामीण, तीन दिन तक होते हैं कार्यक

Tue, 11 Mar 2025 08:20 PM IST
डिंपल सिरोही न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सहारनपुर

सार

सहारनपुर जनपद के इस गांव में होली पर हुड़दंग नहीं होता बल्कि इस दिन गांव के ज्यादातर हुड़दंग से दूर रहकर प्रवचन और भजनों का आनंद लेते हैं।
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होली - फोटो : अमरज उजाला
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विस्तार
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सहारनपुर जनपद के बिहारीगढ़ थानाक्षेत्र के गांव औरंगाबाद में करीब सौ साल पहले दुल्हेंडी पर एक ग्रामीण के मुंह पर कालिख पोतने की घटना के बाद आर्य समाज ने तीन दिवसीय धार्मिक कार्यक्रम की शुरुआत की थी, जो आज भी बदस्तूर जारी है। इस दिन गांव के ज्यादातर हुड़दंग से दूर रहकर प्रवचन और भजनों का आनंद लेते हैं।

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बुजुर्ग बताते हैं कि गांव में वर्ष 1927 से यह परंपरा चली आ रही है। होलिका दहन, दुल्हेंडी तथा इससे अगले दिन तक आर्य समाज के तत्वावधान में गांव का भ्रमण कर लोगों को उपदेश देकर वेदों का अनुसरण करने के लिए प्रेरित किया जाता है।

महर्षि दयानंद सरस्वती के संदेशों को घर-घर पहुंचाया जाता है। तीनों दिन यज्ञ होता है जिसमें हर घर से भागेदारी होती है। इस दौरान भजनोपदेशक अपने भजनों तथा उपदेशों से लोगों को समाज में फैली कुरीतियों से बचने के लिए प्रेरित करते हैं। नशे से दूर रहने की सीख देते हैं। आज भी यह परंपरा चली आ रही है।

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बुजुर्गों ने पंचायत में की थी धार्मिक आयोजन की पहल
गांव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति धर्मपाल कांबोज (106) बताते हैं उनके गांव में 99 वर्ष पूर्व रंग वाले दिन गांव के ही लोगों ने एक ग्रामीण का मुंह कालिख से पोत दिया था। इस पर गांव के जिम्मेदार लोगों ने एतराज किया तथा पंचायत कर इस तरह की हरकतों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए इस धार्मिक आयोजन की पहल की थी।

हुड़दंगबाजी से बचे रहते हैं ग्रामीण
गांव निवासी सतपाल का कहना है बड़े बुजुर्गों ने हुड़दंगबाजी से बचने के लिए होली के दिन इस कार्यक्रम को विशेष रूप से रखा है। गांव के लोग इसमें व्यस्त रहते हैं। ऐसे में वह हुड़दंग से बच जाते हैं।
 
 

केवल बच्चों की टोलियां ही खेलती है रंग
गांव निवासी युवा भाजपा नेता सचिन कांबोज बताते हैं फाग के दिन उनके गांव में बच्चे ही रंग खेलते हैं। युवा और बुजुर्ग नशे और हुड़दंगबाजी से दूर रहकर भजनों का आनंद लेते हैं। यह तीन दिन ग्रामीणों के लिए आत्मशुद्धि करने का बेहतर अवसर लेकर आते हैं।
 
गांव में होली पर नहीं हुआ कभी झगड़ा
ग्राम प्रधान रविता देवी ने बताया कि रंगों के इस त्योहार पर अधिकतर लोग नशाखोरी तथा हुड़दंगबाजी की ओर अग्रसर रहते हैं। कुछ तो अपनी रंजिश तक निकालते हैं। उनके गांव में फाग पर कभी लड़ाई झगड़ा नहीं हुआ। यह बड़े बुजुर्गों की चलाई परंपरा का ही परिणाम है।

 
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जिले के बरसी गांव में ग्रामीण नहीं करते हैं होलिका दहन
ब्रज जैसे गांव बरसी में होलिका दहन नहीं होता। मान्यता है कि गांव के महाभारतकालीन ऐतिहासिक मंदिर में महादेव का वास है। इसलिए जब होलिका दहन किया जाता है तो भगवान के पैर झुलस जाते हैं।

तीतरों के गांव बरसी में भगवान शिव का ऐतिहासिक मंदिर है। किवदंती है कि महाभारत काल में बरसी गांव में एक बार होलिका दहन किया गया था, जिसके बाद भगवान शिव के पैर झुलस गए थे। होली पर्व को लेकर ग्रामीणों के मन में अनेक धारणाएं हैं। इनके कारण गांव में होली पर्व के पूजन से ग्रामीणों को कोई सरोकार नहीं है।

कहा जाता है कि सदियों पहले किसी बुजुर्ग के स्वप्न में भगवान शंकर ने यह चेतावनी दी थी कि होलिका दहन से उनको कष्ट होता है। इसलिए गांव में होलिका दहन नहीं होना चाहिए। पूर्वजों ने इसे गंभीरता से लेते हुए इस पर्व का ही त्याग कर दिया। 
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