संवाद न्यूज एजेंसी
सहारनपुर। सरकार के तमाम दावों के बीच जिले में मिनी सचिवालयों की स्थापना कर एक ही छत के नीचे ग्रामीणों को सभी सुविधाएं उपलब्ध कराने की कवायद परवान नहीं चढ़ सकी है। बहुत सी जगह तो मिनी सचिवालय की स्थापना के लिए जमीन तक मुहैया नहीं हो सकी है। जहां बदहाल पड़े पंचायत घरों को मिनी सचिवालय में तब्दील करना था वहां उनकी मरम्मत तक नहीं की जा सकी है। इन सचिवालयों में घास उगी है। इमारतें गिरने के कगार पर पहुंच गई हैं।
ब्लाक साढ़ौली कदीम की 85 ग्राम पंचायतों में से 33 में नए मिनी सचिवालय बनने थे, जबकि बाकी में पूर्व में बने पंचायत भवनों को ही मिनी सचिवालय में तब्दील करना था। अब तक केवल आठ ग्राम पंचायतों में ही नए भवनों का निर्माण हो सका है। चाटकी, बहरामपुर, कांसेपुर समेत चार ग्राम पंचायतों में भवन निर्माण के लिए भूमि तक नहीं मिल सकी है। पहले से बने पंचायत भवनों को दशा सुधारने का कार्य भी अधर में है। इनकी हालत यह है कि ये खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। परिसर घास-फू स से अटे हैं। बदहाली का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि ब्लॉक प्रमुख विश्वास चौधरी के गांव मीरपुर गंदेवड़ का पंचायत घर तक जर्जर है। खैरी मढ़ती के बदहाल पंचायत भवन में ऊंची ऊंची घास खड़ी है। अभी तक किसी भी सचिवालय पर मिलने वाली सुविधाओं का संचालन शुरू नहीं हो सका है। ग्रामीणों का कहना है कि सचिव तक भी ग्राम पंचायतों में नहीं आते। उन्हें अपने कार्य के लिए ब्लॉक कार्यालय की दौड़ लगानी पड़ती है।
बीडीओ विजय सिंह ने बताया कि कुछ ग्राम पंचायतों में जमीन नहीं मिल सकी है। उनमें भवन निर्माण नहीं हो सका है। जिन ग्राम पंचायतों में पहले से पंचायत घर बने है, उनकी मरम्मत का कार्य चल रहा है। कुछ जगह पंचायत सहायक बैठने शुरू भी हो गए हैं।
गंगोह ब्लाक के अधिकांश गांवों में सचिवालयों के भवन खंडहर में तब्दील हो चुके हैं और उनमें घास जम चुकी है। गांव शेरमऊ में बने मिनी सचिवालय में भी चारों ओर घास जमी है। ग्रामीण जसवीर, मनीष, सुनील और परवीन आदि का कहना है कि गांव में सुविधा नहीं मिलने के कारण उन्हें छोटे-छोटे कार्यों के लिए भी कई किलोमीटर दूर गंगोह ब्लॉक जाना पड़ता है। ग्राम सचिव नितिन मालिक ने बताया कि भवन की मरम्मत का कार्य शुरू करा दिया गया है। जल्द ही यहां कंप्यूटर आदि की व्यवस्था कर कार्य शुरू कर दिया जाएगा।
पुवांरका ब्लॉक के गांव मक्काबांस में ना तो पंचायत भवन है और ना ही अभी तक मिनी सचिवालय बन पाया है। गांव के शौक अली, सत्तार, इश्तियाक आदि का कहना है कि सचिव भी गांव में यदा कदा ही आते हैं। जब आते भी हैं तो ग्राम प्रधान के यहां ही कार्य करके चले जाते हैं। ऐसे में उन्हें पुवांरका की दौड़ लगानी पड़ती है।