सहारनपुर। धान की फसल में मृदाजनित रोगों से परेशान किसानों के लिए राहत भरी खबर है। धान नर्सरी की सौरीकरण तकनीक इन रोगों से बचाव में कारगर साबित हो रही है। इस तकनीक में नर्सरी वाली जमीन को चार से छह सप्ताह तक पॉलीथिन से ढंककर रखा जाता है, जिससे मृदा में मौजूद विभिन्न बीमारियों के विषाणुओं के साथ ही खरपतवार भी नष्ट हो जाते है।
धान में लगने वाले कई रोग मृदाजनित होते हैं। इनमें निमेटोड, बकानी, पौध गलन, पत्ती एवं पौध झुलसा आदि शामिल हैं। इन रोगों के चलते प्रतिवर्ष 10 से 30 फीसदी तक धान का उत्पादन प्रभावित होता है। नर्सरी की सौरीकरण विधि को अपनाकर इन रोगों पर खासा नियंत्रण किया जा सकता है। इसके चलते कृषि वैज्ञानिक किसानों को नर्सरी की सौरीकरण तकनीक अपनाने के लिए जागरुक कर रहे हैं। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी एवं फसल सुरक्षा विभाग के प्रोफेसर डॉ.आईके कुुशवाहा का कहना है कि इस तकनीक से मृदा में पहले से मौजूद विभिन्न रोगों के विषाणुओं पर नियंत्रण हो सकता है। इस विधि को अपनाने पर फसल में रोगों के नियंत्रण के लिए होने वाले कीटनाशकों के खर्च में भी कमी आती है।
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नर्सरी की सौरीकरण विधि
कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी डॉ. आईके कुशवाहा ने बताया कि सौरीकरण तकनीक से तैयार होने वाली नर्सरी में धान की स्वस्थ पौध तैयार होती है। इस विधि में पहले धान की नर्सरी वाले खेत की सिंचाई की जाती है और उसके ओट आने पर जुताई की जाती है। फिर नर्सरी तैयार करनी वाली भूमि को समतल करके पूरे खेत को चार से छह सप्ताह तक पॉलीथिन से ढंककर उसके किनारों को मिट्टी चढ़ा देते हैं। इससे पॉलीथिन के अंदर की गर्मी बाहर नहीं निकलती। इस गर्मी से धान में लगने वाले मृदाजनित रोगों के बिजाणु नष्ट हो जाते हैं।