सहारनपुर। सीएचसी और पीएचसी जन सुविधा के लिए बने हैं, मगर जनपद में चिकित्सकों और स्टाफ की भारी कमी है। इसके चलते मरीजों को जरा सा गंभीर होने पर भी रेफर कर दिया जाता है। इसके अतिरिक्त जांच की सुविधाएं नहीं हैं। कई जगह जांच मशीनें ताले में बंद हैं। विश्व स्वास्थ्य दिवस पर बुधवार को अमर उजाला की टीम ने जनपद की कुछ सीएचसी और पीएचसी पर मौजूद सुविधाओं की पड़ताल करने की। पेश है रिपोर्ट...
विशेषज्ञ चिकित्सकों का अभाव
रामपुर सीएचसी से ज्यादातर मरीजों को रेफर किया जाता है। यहां बाल रोग विशेषज्ञ, नेत्र रोग विशेषज्ञ, सर्जन और सबसे जरूरी महिला चिकित्सक नहीं हैं। इसकी वजह से महिला मरीजों को व्यक्तिगत समस्याएं पुरुष चिकित्सक से साझा करने में परेशानी आती है। इसके चलते वे मजबूरन निजी चिकित्सकों के पास जाती हैं। यहां स्टाफ नर्स के भी तीन पद रिक्त हैं।
जिला अस्पताल से संबद्ध
फतेहपुर सीएचसी पर जनरल सर्जन, ऑर्थोपेडिक सर्जन, एनेस्थेटिक के साथ ही स्टाफ नर्स के दो पद खाली हैं। बाल रोग विशेषज्ञ जिला अस्पताल से संबद्ध हैं। प्रभारी डॉ. कपिल देव ने बताया कि सुविधाओं के लिए उच्चाधिकारियों को पत्र लिखा गया है।
दुर्घटना होने पर उपचार की सुविधा नहीं
हरोड़ा सीएचसी पर भी सर्जन का पद खाली है। ऐसे में सहारनपुर से देहरादून तक 70 किलोमीटर के रास्ते में दुर्घटना होने की दशा में गंभीर रोगी के उपचार के लिए सरकारी सुविधा नहीं हैं। हरोड़ा सीएचसी पर भी बाल रोग विशेषज्ञ और स्टाफ नर्स के तीन पद खाली हैं। एक चिकित्सक छह माह से गैरहाजिर हैं।
दस वर्षों से कमरे में बंद अल्ट्रासाउंड मशीन
सीएचसी देवबंद पर चिकित्सा सुविधाओं का घोर अभाव है। 30 बेड वाली इस सीएचसी में 11 चिकित्सकों के सापेक्ष महज दो चिकित्सक कार्यरत हैं। जबकि महिला चिकित्साधिकारी, रेडियोलोजिस्ट, फिजिशियन, जनरल सर्जन, आर्थोपेडिक सर्जन, दंत रोग विशेषज्ञ और ईएनटी सर्जन के पद लंबे समय से खाली हैं। टेक्नीशियन नहीं होने की वजह से अल्ट्रासाउंड मशीन दस साल से कमरे में बंद है। ऐसे में खासकर गर्भवती महिलाओं को निजी अस्पतालों में जाना पड़ता है। चिकित्सा अधीक्षक डॉ. इंद्राज सिंह का कहना है कि रिक्त पड़े पदों को भरने के संबंध में कई बार पत्र लिखा है।
झोलाछाप का सहारा
सीएचसी नागल पर चिकित्सकों और स्टाफ के छह पद खाली हैं। एक्सरे तक की सुविधा नहीं है। साढौली कदीम में चिकित्सकों के पांच तथा अन्य स्टाफ के 13 पद खाली हैं। ऐसे में मरीजों को इलाज के लिए जिला अस्पताल जाना पड़ता है। अधिकतर लोग झोलाछाप के भरोसे हैं।