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बाबा जाहरवीर के सम्मान में बसेरों की धूम

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सहारनपुर। बाबा श्री जाहरवीर गोगा की म्हाड़ी पर देश में बागड़ के बाद से सबसे बड़ा मेला भरता है। इन दिनों बाबा जाहरवीर के सम्मान में जगह-जगह बसेरों का आयोजन किया जा रहा है। महानगर में रंग-बिरंगी छड़ियां भ्रमण कर रही है, जिससे वातावरण भक्तिमय बना हुआ है। रविवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु म्हाड़ी पर पहुंचे और प्रसाद चढ़ाने के साथ कढ़ी चावल का भंडारा किया। बैंडबाजों संग श्रद्धालु छड़ियों को अपने घर लेकर जा रहे हैं।
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शहर से करीब तीन किलोमीटर दूर गंगोह रोड स्थित म्हाड़ी पर इस वर्ष मेले की शुरूआत शुक्ल पक्ष की दशमी पर 16 सितंबर को होनी है। दो सप्ताह तक शहर में भ्रमण करने और बसेरों के बाद जाहरवीर गोगा के प्रमुख चिन्ह नेजा की अगुवाई में 26 छड़ियां बैंडबाजों संग विभिन्न इलाकों से होती हुई विश्रामपुरी काल भैरव मंदिर पहुंचेंगी और यहां से पूजन के उपरांत म्हाड़ी की ओर प्रस्थान कर जाएंगी। म्हाड़ी पर छड़ियों के पहुंचने से पूर्व लाखों की संख्या में श्रद्धालु छड़ियों के इंतजार में मौजूद रहते हैं। जैसी ही छड़ियां अपने स्थलों पर पहुंचती है तो सर्वप्रथम प्रसाद चढ़ाने और मन्नत मांगने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। दो दिन म्हाड़ी पर मेला चलने के बाद तीसरे दिन छड़ियां वापस अपने-अपने स्थानों पर प्रस्थान करती हैं। इन दिनों मेले से पूर्व बाबा श्री जाहरवीर की शान में जगह-जगह बसेरों और जागरण का आयोजन किया जा रहा है। रात के समय छड़ियों के भक्त श्रद्धालुओं को बाबा की वीरता के किस्से सुना रहे हैं। शहर में लगने वाले बसेरों में कढ़ी चावल का प्रसाद वितरित किया जा रहा है। रविवार को म्हाड़ी पर भारी भीड़ रही।
जब अंग्रेज शासक ने की थी मेला रुकवाने की कोशिश
छड़ी के भक्त पंकज उपाध्याय, गुलशन सागर, विनोद प्रकाश बताते हैं आजादी से पूर्व एक अंग्रेजी शासक ने म्हाड़ी पर भरने वाले मेले को रुकवाने की कोशिश की थी, लेकिन तब उस अंग्रेजी शासक के घर में जगह-जगह सांप निकल आए थे। तब, उसने मेला आयोजित करने की अनुमति दी थी और खुद भी म्हाड़ी पर जाकर प्रसाद चढ़ाया था। बीते वर्ष कोरोना संक्रमण की वजह से 800 वर्ष के इतिहास में म्हाड़ी पर मेला नहीं भरा था, लेकिन छड़ियों के भक्तों ने वहां पूजा अर्चना कर भंडारा आयोजित किया था।
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कबली भगत को दिया था नेजा
छड़ियों के भक्त बताते हैं कि बाबा श्री जाहरवीर गोगा महाराज अक्सर गंगा स्नान के लिए हरिद्वार जाते थे। यात्रा के दौरान वह गंगोह मार्ग पर रुका करते थे। बाबा श्री जाहरवीर ने 800 वर्ष पूर्व कबली भगत को गंगोह मार्ग पर तालाब से मछलियां पकड़े देखा था। तब बाबा ने कबली भगत से कहा था कि वह मछली पकड़ने का काम छोड़कर इस स्थान पर म्हाड़ी बनवाकर पूजा करे। बाबा ने कबली भगत को चांदी का नेजा दिया था। कबली भगत ने बाबा जाहरवीर को अपनी जीविका चलाने की मजबूरी बताई थी। तब बाबा ने कहा था कि यदि वह भादो माह में शुक्ल पक्ष की दशमी को उनके नाम का मेला भरवाए तो उसकी रोजी-रोटी पूरे वर्ष चलती रहेगी। कबली भगत ने उनकी आज्ञा को माना और यहां म्हाड़ी का निर्माण करा दिया। तभी से म्हाड़ी स्थल पर बाबा श्री जाहरवीर की शान में मेला लगता आ रहा है।
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