बड़गांव। अंग्रेजी शासन के दौरान बड़गांव क्षेत्र में क्रांतिकारियों की सक्रियता बढ़ने पर बड़गांव में देवबंद-नानौता क्षेत्र के पहले थाने की स्थापना की गई थी। 1904 में बने इस थाने में ही आजादी का बिगुल बजाने वाले देशभक्तों को यहां रखकर यातनाएं दी जाती थीं। पहली एफआईआर 1907 में उर्दू भाषा में बड़गांव थाने में काटी गई थी जो आज भी यहां के रिकार्ड में सुरक्षित है।
ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ स्वाधीनता के बिगुल की गूंज बड़गांव तक पहुंची तो गांव मौरा स्थित ठाकुरद्वारा मंदिर में क्रांतिकारियों की गतिविधियां बढ़ने लगी। इन क्रांतिकारियों पर नजर रखने की नीयत से अंग्रेजी शासकों ने वर्ष 1904 में एक कमरा यहां किराए पर लेकर एक दारोगा चार सिपाही तैनात कर थाने की शुरुआत की थी। चार साल बद वर्ष 1907 में यहां भवन का निर्माण कर थाने का विधिवत संचालन शुरू किया गया था।
उस दौरान उर्दू भाषा में हस्तलिखित पहली एफआईआर आज भी थाना रिकार्ड में उपलब्ध है। उस समय बड़गांव थाने का कार्यक्षेत्र नानौता और देवबंद तक फैला था। कच्ची सड़कें व वाहन उपलब्ध न होने के कारण पुलिस क्षेत्र में घोड़ों पर गश्त करती थी।
नानौता- देवबंद क्षेत्र के क्रांतिकारियों को थाने लाकर ही सजा के रूप में यातना दी जाती थी। बाद में नानौता व देवबंद में बड़गांव थाने की चौकियां बनाई गई। आजादी के बाद देवबंद पुलिस चौकी को जहां कोतवाली का दर्जा मिला वहीं बड़गांव थाना आज उसी स्वरूप में है।
दो वर्ष पहले यहां दो नई इमारतों का निर्माण कराया गया है। वर्तमान में यहां दो निरीक्षक 10 उपनिरीक्षक सहित 40 पुलिस कर्मी तैनात हैं। थानाध्यक्ष विनय कुमार शर्मा बताते हैं कि अंग्रेजी शासन में बनाई गई डाट की इमारतें आज भी बेहतर है जिसमें थाना ऑफिस और थाना प्रभारी निवास, हवालात, मालखाना, मेस आदि चल रहा है। इनकी समय-समय पर मरम्मत कराई जाती रहती है। (संवाद)