कानून में बलात्कार की सजा चाहे जो भी हो, सपेरा समुदाय में नाथ संप्रदाय के न्यायाधीश बलात्कारी को पीड़िता से शादी रचाने की सजा सुनाते हैं। आरोपी पक्ष को शादी का खर्चा भी उठाना पड़ता है। यदि बलात्कारी हत्या का भी कुसुरवार है तो उसको ईंट-पत्थर मारने, गर्म अथवा अत्यंत ठंडे पानी में खडे़ रहने की सजा देने के बाद पूरे परिवार सहित उसे समुदाय से बहिष्कृत कर दिया जाता है।
ऐसा नहीं है कि नाथ संप्रदाय के लोग कानून को नहीं मानते हैं। अदालत तो सजा देती ही है, सामुदायिक कचहरी में भी जुर्म पर सुनवाई होती है। दोषी को सजा सुनाई जाती है। 50 हजार से 5 लाख रुपए तक का अर्थदंड लगाया जाता है। अदालत की पूरे देश के नाथ संप्रदाय में मान्यता है।
औरैया जिले में कंचौसी के पास है सपेरों का गांव डेरा जोगी ढिकियापुर। यहां के लोग नाथ संप्रदाय में आस्था रखते हैं। सांप पकड़ना, सांपों और बीन के सहारे सुदूर क्षेत्रों में भिक्षाटन ही इनकी जीविका का प्रमुख साधन है। ये लोग प्रदेश ही नहीं पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली तक इसी तरह जीविकोपार्जन के लिए जाते हैं। इनकी गिनती घुमंतू जातियों में की जाती है। नाथ संप्रदाय की अपनी मान्यताएं और परंपराएं हैं।
सपेरा समाज की अदालत
डेरा जोगी गांव की एक खास विशेषता यह है कि यहां पूरे देश के सपेरा समाज के लोगों की अदालत लगती है। देश भर से समाज के लोग यहां की अदालत के लिए जज नियुक्त करते हैं। इस गांव में होली के बाद पंचमी को हर वर्ष अदालत लगती है, जिसमें सभी प्रकार के विवादों की सुनवाई के बाद निर्णय सुनाए जाते हैं। पंद्रह दिन तक चलने वाली अदालत में देश भर से करीब एक हजार प्रतिनिधि भाग लेते हैं।
अदालत में चार सदस्यीय न्यायपीठ होती है, जिसमें 50 वर्षीय लोंगनाथ, इलायची नाथ, पंजाब के देवनाथ और गुड्डा नाथ न्यायाधीश की भूमिका निभाते हैं। ढिकियापुर के गुड्डा नाथ बताते हैं कि अदालत में मारपीट, चोरी, एक पति के जीवित रहते दूसरा विवाह करना आदि सभी प्रकार के मामलों की सुनवाई होती है।
खासतौर पर बलात्कार के मामलों को लेकर अदालत का रुख काफी सख्त रहता है। बलात्कार का मामला आने पर पीड़िता की शादी दुष्कर्म करने वाले से ही कराई जाती है। शादी का खर्चा लड़के वाले उठाते हैं। इसके अलावा उन पर 50 हजार रुपए तक का अर्थदंड लगाया जाता है।
किसी मामले में यदि पीड़िता की हत्या कर दी गई हो तो आरोपी को शारीरिक प्रताड़ना के लिए कड़ी से कड़ी सजा दी जाती है। उसके पूरे परिवार को समाज से बहिष्कृत करते हुए 5 लाख रुपए तक अर्थदंड लगाया जाता है। धनराशि पीड़िता के परिवार को दी जाती है। उनका कहना है कि हम लोग भारतीय संविधान के कानूनों को भी मानते हैं। वह मामले अलग चलते हैं।
केस-1
कानपुर देहात के डेरा खरका में करीब 15 वर्ष पहले एक व्यक्ति की हत्या हो गई थी। समाज की अदालत ने हत्यारों से दो लाख रुपए जुर्माना वसूला। फैसले के मुताबिक उसके परिवार का खर्चा हत्याभियुक्त ही उठा रहा है।
केस-2
कानपुर देहात के परजनी में वर्ष 2007 में विवाहिता को खुमरानाथ भगा ले गया था। अदालत ने विवाहिता को उसके पति के पास वापस कराया। आरोपी से 50 हजार रुपए जुर्माना वसूल करते हुए समाज को दावत कराई गई। दावत का खर्चा भी आरोपी ने ही उठाया
केस-3
कंचौसी के डेरा में छह वर्ष पूर्व समाज की लड़की को फक्कड़नाथ भगाकर ले गया था। अदालत ने लड़की को परिजनों को वापस कराया। उसकी दूसरी जगह रीति रिवाज के अनुसार शादी कराई गई। शादी का खर्चा आरोपी से ही कराया गया।
इस तरह होती है सुनवाई
नाथसंप्रदाय के छोटे मामले स्थानीय पंचायत में पंच अपने स्तर से निपटाते हैं। बडे़ मामले हाईकोर्ट कही जाने वाली वार्षिक पंचायत में लाए जाते हैं। शिकायतकर्ता को मौखिक ही पहले अपनी शिकायत पंच से करनी पड़ती है। पंच ही वादी प्रतिवादी को वार्षिक पंचायत की तारीख देते हैं। पंच दोनों पक्षों को लेकर वार्षिक पंचायत में आते हैं। मौखिक ब्योरा न्यायपीठ के सामने पेश किया जाता है।
दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद मौखिक ही फैसला सुनाया जाता है। फैसलों के खिलाफ कोई जुबान नहीं खोलता है। मामले की तारीख लेने के बाद यदि कोई पक्ष वार्षिक अदालत में नहीं आता है तो उस पर पांच से लेकर 50 हजार रुपए तक जुर्माना किया जाता है। उसके किसी नजदीकी या रिश्तेदार द्वारा जुर्माना अदा न करने की स्थिति में समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है।